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सुप्रीम अदालत ने गोकशी को ग़लत माना

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एक तरफ गोकशी को लेकर देश भर में सुप्रीम अदालत ने गोकशी को ग़लत माना सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ गोकशी पर रोक को सही ठहरा चुकी है. 

इस संविधान पीठ की अध्यक्षता करने वाले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोती ने सुप्रीम कोर्ट के ही 47 साल पुराने फैसले को पलट दिया था. 

वर्ष 1958 में सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गोकशी पर रोक लगाने वाले बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कानून को गलत बताते हुए रद्द कर दिया था. उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि गोकशी या बैल सांड आदि की कटाई पर पूरी तरह रोक लगाना जनहित में नहीं है. इसके अलावा कोर्ट ने यह भी कहा था कि गोमांस या भैंसे का मांस भारत मे बड़ी संख्या में लोगों के भोजन का हिस्सा है. गरीब लोग इससे अपनी प्रोटीन आदि की जरूरत पूरी करते हैं. साथ ही कोर्ट ने कहा था कि जो गायें दूध नहीं देतीं या जो बैल खेती या किसी काम के नहीं हैं, उन्हें रखना बेकार है, उनकी कटाई हो जानी चाहिए.

लेकिन 47 साल बाद 26 अक्टूबर 2005 को सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 1958 का फैसला पलट दिया. कोर्ट ने गोमांस और भैंसे के मांस को भोजन का महत्वपूर्ण जरिया  मानने की दलील खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि भारत में अब भोजन की कमी की समस्या नहीं है. यहां ज्यादा प्रोटीन वाला भोजन उपलब्ध है. समस्या सिर्फ उसके सही वितरण की है।

इस फैसले में कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 48 में गोकशी रोकने की सरकार की जिम्मेदारी का भी हवाला दिया. कोर्ट ने गुजरात राज्य बनाम मिर्जापुर मोती कुरैशी कसाब जमात व अन्य के बारे में दिए गए अपने इस फैसले के पैराग्राफ़ 67 में कहा था कि भारत के हर नागरिक और राज्य को जीवित प्राणी के प्रति सहृदय होना चाहिए. उसके प्रति दया की भावना होनी चाहिए.

फ़ैसले में कहा गया कि जीवित प्राणियों के प्रति सहृदयता की अवधारणा संविधान के अनुच्छेद 51ए जी में दी गई है, जो कि भारत की सांस्कृतिक विरासत पर आधारित है. ये महात्मा गांधी, बिनोवा भावे, महावीर, बुद्ध नानक आदि की भूमि है. दुनिया के किसी भी हिस्से में कोई भी धर्म या पवित्र ग्रन्थ क्रूरता का पाठ नहीं पढ़ाता और न ही क्रूरता को बढ़ावा देता है. भारतीय समाज बहुलता का समाज है। यहां अनेकता में एकता है. सभी एक सुर में कहते हैं कि किसी भी जीवित प्राणी के प्रति क्रूरता समाप्त होनी चाहिए. 

उस फैसले के इन अंशों को अहिंसा के दर्शन रखने वाले जैन पर्व पर्युषण के दौरान मांस बिक्री रोकने को सही ठहराने वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दर्ज किए हैं. उस फैसले में कोर्ट ने गाय और बैलों की उपयोगिता और गोबर के महत्व को भी दर्ज किया है. 

संविधान में गोकशी पर रोक की सलाह

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गोकशी भारत में एक विवादास्पद विषय बन गया है, इसीलिए गोकशी को लेकर बनाये जाने वाले क़ानून प्रभावी नहीं हो पाते. जबकि धर्म और आस्था ही नहीं, सामाजिक रूप से भी गोहत्या का सदैव निषेध होता रहा है. गोकशी रोकने के लिये भारत के विभिन्न राज्यों में कानून भी बनाये गये हैं।

संविधान निर्माताओं ने राज्यों को दिए नीति-निर्देशक सिद्धांतों में गौवध एवं अन्य दुधारू पशुओं के वध पर रोक लगाने का परामर्श दिया है. 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 के मुताबिक राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों के माध्यम से बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे. हालांकि इस अनुच्छेद में किसी भी राज्य के लिए इस कानून को बनाने की बाध्यता नहीं रखी गई. 

संविधान लागू होने के तुरंत बाद अधिकांश राज्यों ने गाय के संरक्षण और उसके वध पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाया. ‘असम मवेशी संरक्षण अधिनियम’ 1950 में ही आ गया. उसके बाद अधिकांश राज्यों ने अपने यहां 1955 में कानून बनाए. फिर उसके बाद के बरस में भी कानून बनते रहे.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 (ए) पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार तथा वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा की बात करता है. संविधान (42 वाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 48 (ए) जोड़ा गया. जिसमें गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाने के लिए स्पष्ट रूप से कहा गया है. 

भारत के संविधान के अनुच्छेद 48 में राज्यों को गायों और बछड़ों और अन्य दुश्मनों और मसौदे के मवेशियों की हत्या को प्रतिबंधित करने का आदेश दिया गया है. 26 अक्टूबर 2005 को, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में भारत में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अधिनियमित विरोधी गाय हत्या कानूनों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। भारत में 29 राज्यों में से 20 में वर्तमान में हत्या या बिक्री को प्रतिबंधित करने वाले विभिन्न नियम हैं. 

भारत में मौजूदा मांस निर्यात नीति के अनुसार, गोमांस (गाय, बैल का मांस और बछड़ा) का निर्यात प्रतिबंधित है. मांस, शव, बफेलो के आधे शव में भी हड्डी निषिद्ध है और इसे निर्यात करने की अनुमति नहीं है. 

26 मई 2017 को केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने पूरे विश्व में पशु बाजारों में वध के लिए मवेशियों की बिक्री और खरीद पर प्रतिबंध लगाया, जिसमें पशु विधियों की क्रूरता की रोकथाम के तहत हालांकि जुलाई 2017 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मवेशियों की बिक्री पर प्रतिबंध को निलंबित कर दिया. 

अहिंसा के नैतिक सिद्धांत के अनुसार विभिन्न भारतीय धर्मों भी गोहत्या का विरोध करते हैं. 

गाय जीव और जीवन दोनों के लिए आवश्यक है. गाय आजीविका का एक अभिन्न हिस्सा है. गोवंश के उत्पाद  हमारी आर्थिक आवश्यकता भी पूरा करते हैं. 

कब हुर्इ भारत में गौहत्या की शुरूआत

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भारत में पहली बार 1000 र्इ. के आसपास जब विभिन्न इस्लामी आक्रमणकारियों तुर्की, र्इरान (फारस), अरब और अफगानिस्तान से आये तो वे अपनी इस्लामी परंपराओं के अनुसार विशेष अवसरों पर ऊंट और बकरी, भेड़ बलिदान करते थे। हालांकि, मध्य और पश्‍चिम एशिया के इस्लामी शासक, गोमांस खाने के आदी नहीं थे, उन्होंने भारत में आने के पश्‍चात्‌ गाय के वध को और गायों की कुरबानी, विशेष रूप से बकरी – र्इद के अवसर पर शुरू कर दिया। उन्होंने भारत के मूल निवासियों को अपमानित करने और उनके भोजन प्रयोजनों में संप्रभुता और श्रेष्ठता साबित करने के लिए किया था। इनके इस कार्य अर्थात गौवध के कारण इस देश के मूल हिंदू आबादी में असंतोष पनपने लगा। कहा जाता है हिंदुओं के विरोध को संज्ञान लेते हुए अकबर और औरंगजेब जैसे मुगल शासकों ने मुस्लिम त्यौहारों के दौरान गायों की हत्या और गायों की कुरबानी को निषिद्ध घोषित किया था।

भारत में गौकशी

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गोकशी आज देश और समाज के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है. गाय पूज्यनीय है. गाय को माता का दर्ज़ा दिया गया है. फिर भी गाय सुरक्षित नहीं है. अनुपयोगी होने पर गाय को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. बिनदुधारू या कम दूध देने वाली, बूढ़ी, अपाहिज, बीमार गोवंश को कसाई के हाथों बेच दिया जाता है. 

हालांकि, देश के अलग अलग राज्यों में गोकशी को रोकने के लिए गौ-संरक्षण कानून बनाये गए हैं. लेकिन इन कानूनों को सही ढंग से लागू नहीं कराया जा रहा है. यही वजह है कि कानून के होते हुए भी गो-हत्याओं को बढ़ावा मिल रहा है. 

गोकशी को रोकने के लिए देश में आज़ादी से पहले और बाद में अनेक आन्दोलन होते रहे हैं, लेकिन गोकशी रोकने के लिए अभी तक कोई प्रभावी क़ानून नहीं बन सका है. जिन राज्यों में गोकशी निषेध क़ानून बने भी हैं, वो सिर्फ़ औपचारिकता मात्र हैं. ऐसे में गोकशी को रोकने के लिए जनजागरण की ज़रुरत है. जिससे गोवंश का संरक्षण और संवर्धन हो सके.

राजस्थान सरकार का गौ कल्याण मंत्रालय

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गो संरक्षण और गो संवर्धन के लिए राजस्थान सरकार ने गौ कल्याण मंत्रालय बनाने की औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं. यह मंत्रालय ‘काउ साइंस पर पहला विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय’ खोलने में मदद करेगा ताकि गाय को केंद्र बनाकर कृषि और दूसरे क्षेत्रों में रिसर्च हो सके.

मंत्रालय गाय की देसी किस्मों के संरक्षण और उनकी बेहतरी और गौवंश की तस्करी रोकने के लिए एक नीति भी बनाएगा. 

राजस्थान देश का एकमात्र राज्य है जिसने गो-कल्याण के लिए एक अलग मंत्रालय बनाया हुआ है.  इसकी गोशाला में हर दिन जयपुर नगर निगम द्वारा करीब 100 आवारा गायें लाई जाती हैं.

गायों की स्थिति में सुधार लाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं. इनमें सांडों, कमज़ोर और बीमार मवेशियों को अलग करना, टीकाकरण, बेहतर गुणवत्ता वाले सूखे चारे, हरे चारे और अच्छे मवेशी आहार की आपूर्ति शामिल है.

बड़ी संख्या में गोसेवक गोशाला में चारा दान करने के लिए आते हैं. इसके अलावा राज्य सरकार हर दिन प्रत्येक वयस्क मवेशी के लिए 70 रुपये और बछड़ों के लिए 35 रुपये के हिसाब से देती है. साथ ही मजदूरों का वेतन और रखरखाव का ख़र्च भी सरकार उठाती है.

मध्य प्रदेश में गौ-केबिनेट

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मध्य प्रदेश में गौवंश के संरक्षण और संवर्धन के लिए गौ-केबिनेट के गठन किया गया है. इस केबिनेट में पशुपालन, वन, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, राजस्व, गृह और कृषि विकास एवं किसान कल्याण विभाग को शामिल किया गया है.  

कृषि में खाद्यान्न के उत्पादन और कृषकों को फसलों का उचित मूल्य दिलाने के साथ गौ पालन की अहम भूमिका है. कृषि कार्य में संलग्न कृषकों को पशुपालन के लिए काफी समय मिलता है. ‘गौ-केबिनेट’ से गौ पालन की दिक्कतें दूर होंगी और इसे आर्थिक रूप से उपयोगी बनाने की दिशा में योजनाओं और कार्यक्रमों को गति मिलेगी. साथ ही गौधन के संरक्षण और संवर्धन के लिए उपायों को अपनाया जायेगा.

मध्यप्रदेश में गौ-केबिनेट के गठन से पशुपालक, गौ-सेवकों, कृषकों और खेतिहर श्रमिकों के आर्थिक कल्याण की संभावनाएं बढ़ेंगी. भारतीय संस्कृति में गौ सेवा का प्रमुख स्थान है. आज भी लाखों परिवार घर में बनी पहली रोटी गौ माता को खिलाते हैं. गौ-माता के दूध से निर्मित घी और गाय के गोबर का पूजा अनुष्ठान में विशेष महत्व है. मध्यप्रदेश सरकार ने गौ-शालाओं के विकास के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाएं हैं.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गौ-केबिनेट के लिए आगर-मालवा जिले में स्थित गौ-अभ्यारण का चयन किया है. यह भारत में प्रारंभ होने वाला प्रथम गौ-अभ्यारण है. मध्यप्रदेश में गौ-सेवकों को गौ-शालाओं के संचालन के लिए सहायता दी गई. साथ ही अशक्त और अस्वस्थ गायों के लिए उपचार और पोषण की व्यवस्थाएं भी की गईं. गौ-सेवा आयोग के माध्यम से विभिन्न गतिविधियां आयोजित कर गौ- शालाओं के विकास के लिए सहयोग किया गया.

मध्यप्रदेश में छह विभाग मुख्य रूप से गौ-केबिनेट निर्णयों के क्रियान्वयन को अंजाम देंगे. गाय के गोबर के कंडों का उपयोग भी किस तरह बढ़े, इस दिशा में कार्य योजना को लागू किया जाएगा. छह विभागों की सक्रियता से क्रियान्वयन के स्तर पर कठिनाई नहीं होगी. समन्वय से कार्य पूरे किए जाएंगे. वर्तमान में गौ-काष्ठ के निर्माण को प्रोत्साहन मिल रहा है. इस उत्पाद के विपणन के नये आयामों पर विचार किया जाएगा. इसी तरह गौ-दुग्ध से निर्मित अन्य वस्तुओं के विपणन के लिए भी प्रयास होंगे.

उप्र में ‘बेसहारा गौवंश सहभागिता योजना’ 

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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जुलाई 2019 में छुट्टा गायों की समस्या को लेकर ‘बेसहारा गोवंश सहभागिता योजना’ शुरु की है।

उत्तर प्रदेश में आवारा पशुओं की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है. किसान परेशान हैं कि उनकी फसल को आवारा जानवर चौपट कर जाते हैं. सरकार का दावा है कि इस योजना से आवारा पशुओं की समस्या का समाधान होगा और रोजगार के मौके पैदा होंगे.

गोवंश सहभागिता योजना

कम दूध देने वाली, दूध नहीं देने वाली गाय और पशुपालकों द्वारा गाय के बछड़े को खुला छोड़ देने से गाँव में गोवंशों की संख्या काफी बढ़ जाती है जिससे खेती करना मुश्किल हो जाता है| यह सभी गोवंश सडक पर आ जाने के कारण दुर्घटना की स्थिति बनी रहती है| इसी को ध्यान में रखते हुये उत्तर प्रदेश सरकार बेसहारा गोवंश के लिए गोवंश सहभागिता योजना लेकर आई है| निराश्रित और बेसहारा गोवंश को पूर्ण रूप से भरण पोषण प्रदान किये जाने और गोवंश के संरक्षण-संवर्द्धन की ये एक महत्वाकांक्षी योजना है| 

इस योजना के तहत जिलाधिकारी जनपद के ऐसे इच्छुक कृषकों, पशुपालकों अथवा अन्य व्यक्तियों को चिन्हित करायेंगे जो निराश्रित गोवंश को पालने के लिए तैयार हैं| ऐसे इच्छुक व्यक्तियों को जिलाधिकारी द्वारा प्रति गोवंश 30 रूपये प्रति दिन की दर से 900 रुपये प्रति माह दिए जायेंगे|    

भरण – पोषण हेतु ये धनराशि पशु पालक के बैक खाते में प्रति माह डी.बी.टी. प्रक्रिया द्वारा हस्तांतरित की जायेगी | इन निराश्रित और बेसहारा गोवंश कि पहचान के लिए उनके  कान में छल्ला अनिवार्य होगा| पशुपालक सुपुर्द किये गए गोवंश को किसी भी दशा में विक्रय नहीं करेगा और न ही छुट्टा छोड़ेगा | 

गोपालक योजना

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने बेरोजगार युवाओं के लिए गोपालक योजना शुरू की है. इसके तहत राज्य सरकार बेरोजगार युवाओं को डेयरी फार्म के द्वारा अपना रोजगार शुरू करने में मदद कर रही है. इसके लिए बैंक बहुत ही आसानी से लोन दे रहे हैं. योजना के तहत बैंक द्वारा 40 हजार रुपये प्रतिवर्ष 5 वर्षों तक प्रदान किए जाएंगे.

उत्तर प्रदेश गोपालक योजना का लाभ 10 -20 गाय रखने वाले पशुपालकों को मिलेगा. योजना में गाय या भैंस रखने का विकल्प खुला है. गोपालक योजना के तहत पशु दूध देने वाला होना चाहिए.

गुजरात गौसेवा मॉडल

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गौसेवा और गौचर विकास बोर्ड, गुजरात सरकार ने आवारा और परित्यक्त पशुओं और देसी गायों की देखभाल और प्रबंधन के लिए “गुजरात गौसेवा मॉडल” विकसित किया है।

देसी गायों का महत्व

देसी गायें शारीरिक क्षमताओं के कारण भारतीय परिवेश का सामना करने में सबसे अधिक सक्षम हैं। धान और गेहूं के भूसे जैसे सूखे चारे पर निर्भर रहते हुए भी एक देसी गाय में स्वस्थ (ए-2) दूध देने की क्षमता होती है। 

आज मिट्टी के क्षरण का सबसे बड़ा कारण रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग है। रासायनिक उर्वरकों के व्यापक उपयोग से मिट्टी में कार्बन का ह्रास हुआ है। 

एक अनुमान के अनुसार गौशाला की खाद/गोबर मिट्टी को अन्य खादों और उर्वरकों की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक नाइट्रोजन और फॉस्फोरिक एसिड की आपूर्ति करती है। गाय के गोबर से बनी खाद सस्ती है और मिट्टी की सभी समस्याओं का समाधान है। 

शोध अध्ययनों ने निष्कर्ष निकाला है कि गाय का गोबर सालाना 1,460 टन सूक्ष्म पोषक तत्व दे सकता है जो मिट्टी की संरचना और 14.6 एकड़ की उर्वरता को समृद्ध करने के लिए पर्याप्त है। जैविक फसल उत्पादन में गाय के गोबर की प्रमुख भूमिका रही है।

गौसेवा मॉडल

गौसेवा और गौचर विकास बोर्ड, गुजरात सरकार ने राज्य में 143 गौशालाओं की पहचान की है, जो 23 परियोजनाओं को मॉडल संस्थानों के रूप में कार्य करेंगी। ये गौशालाएं दवाओं, ऊर्जा / बिजली, जैव-उर्वरक के उत्पादन, कीटनाशक और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए गाय के गोबर और मूत्र का उपयोग करके आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर हैं।

गुजरात सरकार ने 24 घंटे की एम्बुलेंस सेवा शुरू की है, जिसका टोल फ्री नंबर-1962 है। ये एम्बुलेंस इंसानों की तरह ही गायों के स्वास्थ्य देखभाल एवं आपातकालीन बचाव हेतु काम कर रही हैं।

गुजरात राज्य में गौशाला विकास के लिए किए गए प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं।

  • नई गौशालाओं की स्थापना (विशेषकर जेलों, स्कूलों और मंदिरों में),
  • देशी नस्लों (गिरि, कांकरेज और डांगी) के प्राकृतिक प्रजनन के लिए सहायता प्रदान करना
  • गौशाला अनुसंधान पर छात्रवृत्ति प्रदान करना 
  • स्कूलों / कॉलेजों में गौ विज्ञान पाठ्यक्रम 
  • जैविक खेती पर जोर देना 
  • आदिवासी क्षेत्रों में गौशाला जागरूकता 
  • गायों के लिए माइक्रोचिप 
  • शहरी क्षेत्र में कामधेनु छात्रावास 
  • भविष्य की समस्याओं और चुनौतियों पर चर्चा करने के लिए गौशाला विकास पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों/ संगोष्ठियों और कार्यशालाओं का आयोजन करना।
  • गौशाला कार्यकर्ताओं का सम्मान, गौ प्रदर्शनी के माध्यम से जागरूकता एवं संवाद कार्यक्रम आयोजित करना

गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाकर गोवंश को बचाने के लिए ‘गुजरात गौसेवा मॉडल’ को पूरे देश में दोहराया जा सकता है। इस तरह के कार्यक्रम न केवल देशी नस्ल की गायों को बचाए रखेंगे बल्कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करके किसानों की अर्थव्यवस्था का भी समर्थन करेंगे।

गौ संरक्षण – संवर्धन

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आदि काल से ही गाय के महत्त्व को स्वीकार किया गया है, इसीलिये जीवन और जीविका के लिए गाय के संरक्षण और संवर्धन पर सदैव ज़ोर दिया जाता रहा है. लेकिन आज समाज की दिशा बदलने के साथ-साथ गाय की दशा भी बदलती जा रही है. गो वंश की उपयोगिता न समझने के कारण गो हत्या और तस्करी को बढ़ावा मिला है. हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों ने इसे रोकने के लिए क़ानून बनाये हैं. परन्तु इन कानूनों को कड़ाई से लागू करने की ज़रुरत है. इसके साथ ही गो उत्पाद को बढ़ावा देना और बिन दुधारू, बूढ़ी बीमार गायों की देखभाल और रखरखाव के लिए आश्रय स्थल बनाए जाने की भी ज़रुरत है. गौ संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकार के साथ-साथ समाज के हर व्यक्ति को अपनी भूमिका तय करनी होगी. 

राजस्थान पशु चिकित्सा शिक्षा प्रबंधन एवं शोध संस्थान

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राजस्थान पशु चिकित्सा शिक्षा प्रबन्धन एवं शोध संस्थान वर्षों से पशुपालकों व पशुओं के हित में कार्य कर रहा है.  29 मई 2003 को राजस्थान सरकार ने नियमावली संख्या 28/1958 के तहत पंजीकरण संख्या 29 अंतर्गत अन्य उद्देश्यों के साथ कृत्रिम गर्भाधान एवं प्राथमिक उपचार के साथ पशु सेवा हेतु निबंधित किया है. संस्था राजस्थान सरकार अधिनियम 1958 के अंतर्गत पशु सेवा के क्षेत्र में पंजीकृत एक NGO है, जिसे भारतीय संविधान के अंतर्गत पशुओं की देख-भाल, चिकित्सा एवं प्राथमिक पशु चिकित्सा एवं उसके प्रशिक्षण का कार्य करने तथा उसके प्रबंधन का पूर्ण अधिकार है.  संस्थान का कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण राजस्थान है. प्रदेश के विभिन्न भागों में संस्थान अपना कार्य-कलाप करने को पूर्णतया स्वतंत्र है. संस्थान अव्यवसायिक स्वैछिक स्वायतशासी गैर सरकारी संस्थान है.

यहाँ पशु स्वास्थ्य कार्यकर्ता (AHW) के पाठ्यक्रम का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है.  इस के अंतर्गत कोई भी 10वीं पास योग्यताधारी व्यक्ति प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद भारतीय पशुपालन निगम लिमिटेड में नियमानुसार रोजगार प्राप्त कर सकता है तथा स्वयं के स्तर पर पशुओं की चिकित्सा करके स्वरोजगार भी कर सकता है.  यह प्रशिक्षण कौशल विकास हेतु है. इस के जरिये सरकारी नौकरी मिलने का कोई भी दावा संस्थान नहीं करता है. संस्थान निगम की ओर से केवल प्रशिक्षण में प्रवेश करने को अधिकृत है.

संस्थान के उद्देश्य हैं – लाचार, बेबस, बेसहारा पशुओं की देखभाल करना, नि:शुल्क पशुचिकित्सा एवं प्राथमिक उपचार की व्यवस्था करना, संस्थान के सदस्यों को पशुपालन एवं पशु प्रबंधन में प्रशिक्षित करना, पशु चिकित्सा के क्षेत्र में उच्च शिक्षा हेतु शिक्षण व्यवस्था करना, प्रदेश के प्रचुर अकुशल मानवीय संसाधनों के लिए पशु सम्पदा के क्षेत्र में सेवा व रोजगार के अवसरों की तलाश करना, पशु चिकित्सा के क्षेत्र को सामाजिक जाग्रति व जन चेतना के माध्यम से गति करना, कृत्रिम गर्भाधान व उन्नत नस्ल कार्यक्रम का ग्रामीण अंचल में प्रचार प्रसार करना, ग्रामीण अंचल में गंभीर व असाध्य रोगों का शोध व निराकरण करना, राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम में सक्रिय योगदान करना, बेबस एवं आवारा पशुओं तथा गरीब पशुपालकों को नि:शुल्क चिकित्सा सेवा प्रदान करना, पशुओं में टीकाकरण कार्यक्रम को बढ़ावा देना और पशुओं के प्रति क्रूरता व अत्याचारों के प्रति समाज में जागरूकता लाना.