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समृद्धि का द्वार खोलती गौ आधारित खेती

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भारत को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था। यहां के लोग प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर जीवन यापन करते थे। प्रकृति के चक्रानुसार कृषि कार्य करते थे जिसके फलस्वरूप पर्यावरण और जलवायु पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता था। धरती की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती थी जिससे खेतों  से भरपूर उपज प्राप्त होती थी। देश सुखी एवं समृद्ध था।

जबकि आज के खेत यंत्रीकृत और प्रौद्योगिकी संचालित हैं और रिकॉर्ड पैदावार कर रहे हैं। लेकिन उत्पादन में यह वृद्धि एक बड़ी कीमत पर हासिल हुई है। हानिकारक रसायनों और कीटनाशकों ने हमारे भोजन को विषाक्त बना दिया है और इसकी वजह से स्वास्थ्य सम्बन्धी अनेक समस्याएं पैदा हो रही हैं।

यह सही है कि हम एक कृषि आधारित समाज हैं, और हमें अपने गांवों के अपने राष्ट्र के विकास के बारे में सोचने की जरूरत है। लेकिन हमें यह भी ध्यान देना होगा कि उपज को बढ़ाने के लिए उर्वरकों और रसायनों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी के प्राकृतिक पोषक तत्वों को नष्ट करता है। हमें प्राकृतिक संतुलन को वापस लाने के लिए अपने दृष्टिकोण को बदलने की जरूरत है।

आज किसान कीटों को मारने के लिए और उत्पादन को बढ़ाने के लिए रसायनों का उपयोग करते हैं, लेकिन इससे फसल में नकारात्मकता आती है और साथ ही फसल में कीटनाशकों के अवशेष बरकरार रहते हैं, जिससे भोजन अस्वस्थ बन जाता है और कुछ मामलों में तो विषाक्त हो जाता है।

महात्मा गाँधी ने कहा है कि धरती में इतनी क्षमता है कि वह सब की जरूरतों को पूरा कर सकती है, लेकिन किसी के लालच को पूरा करने में वह सक्षम नहीं है

महात्मा गांधी के सोलह आना सच्चे इस वाक्य को ध्यान में रखकर जीरो बजट प्राकृतिक खेती की जाये, तो किसान को न तो अपने उत्पाद को औने-पौने दाम में बेचना पड़े और न ही पैदावार कम होने की शिकायत रहे। लेकिन सोना उगलने वाली हमारी धरती पर खेती करने वाला किसान आज लालच का शिकार हो रहा है।

कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस देश में रासायनिक खेती के बाद अब गौ आधारित जैविक खेती सहित सांद्रिय खेती, पंचगव्य कृषि जैसी अनेक प्रकार की विधियां अपनाई जा रही हैं और संबंधित जानकार इसकी सफलता के दावे करते आ रहे हैं।

परन्तु किसान भ्रमित है। परिस्थितियां उसे लालच की ओर धकेलती जा रही हैं। उसे नहीं मालूम उसके लिये सही क्या है ? रासायनिक खेती के बाद उसे अब जैविक कृषि दिखाई दे रही है। किन्तु जैविक खेती से ज्यादा सस्ती,सरल एवं ग्लोबल वार्मिंग (पृथ्वी के बढ़ते तापमान) का मुकाबला करने वाली “जीरो बजट प्राकृतिक खेती“ मानी जा रही है।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती क्या है?

जीरो बजट प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर आधारित है। एक देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र से एक किसान तीस एकड़ जमीन पर जीरो बजट खेती कर सकता है। देसी प्रजाति के गौवंश के गोबर एवं मूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत तथा जामन बीजामृत बनाया जाता है। इनका खेत में उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार होता है। जीवामृत का महीने में एक अथवा दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है। जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। फसलों की सिंचाई के लिये पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है ।

गाय से प्राप्त सप्ताह भर के गोबर एवं गौमूत्र से निर्मित घोल का खेत में छिड़काव खाद का काम करता है और भूमि की उर्वरकता का ह्रास भी नहीं होता है। इसके इस्तेमाल से एक ओर जहां गुणवत्तापूर्ण उपज होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत लगभग शून्य रहती है। गौ आधारित जैविक खेती करने वाले किसानो का कहना है कि देसी गाय के गोबर एवं गोमूत्र आधारित जीरो बजट वाली प्राकृतिक खेती कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही है।

गौ आधारित जीरो बजट खेती ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडल में आने वाले बदलाव का मुकाबला करने एवं उसे रोकने में सक्षम है। इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाला किसान कर्ज के झंझट से भी मुक्त रहता है।

गौवंश के आर्थिक लाभ

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‘किसानों के खेतों में घुसता हुआ भूखा-प्यासा गौवंश’, ‘कूड़े के ढेरों से कूड़ा व पॉलिथीन खाता हुआ गौवंश’ और ‘सड़कों पर वाहनों से दुर्घटनाग्रस्त होता हुआ गौवंश’ का दिखना आम बात हो गयी है। अवैध रूप से हो रहे गौवंश के वध पर रोक तो लगी, लेकिन उनके रखरखाव और उपयोग की समानांतर व्यवस्था न होने के कारण छुट्टा गौवंश की समस्या बढ़ती जा रही है तथा यह जन आक्रोश का कारण भी बन रही है।

गौवंश का मुद्दा दशकों से सरकारी अदूरदर्शिता से ग्रसित रहा है। अधिक दूध उत्पादन के लालच में हमने जर्सी, होल्सटीन फ्रिजियन जैसी विदेशी नस्लों को बढ़ावा देने से पहले यह नहीं सोचा कि छह-सात ब्यांत के बाद जब ये गाय दूध देना कम कर देंगी तो उनका क्या होगा, उनके नर बछड़ों का क्या होगा?

 विदेशों में दूध कम देने के बाद गायों और नर बछड़ों को कत्लखाने भेज दिया जाता है। भारत में गौवंश, खासकर गाय के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण देश के अधिकांश राज्यों में गौमांस भक्षण और गौहत्या कानूनन अपराध है और सामाजिक रूप से भी पूरी तरह घृणित और निंदनीय है। भारतीय संस्कृति में इसे सबसे घृणित पापकर्म माना जाता है। ऐसी स्थिति में अनुपयोगी गौवंश या तो अवैध रूप से कत्लखाने जाएगा या किसानों और गौशालाओं के ऊपर भार बनकर रहेगा। देश में बढ़ रहे अनुपयोगी गौवंश को उपयोगी बनाने के लिए कुछ मुख्य बिंदुओं पर सरकार को ध्यान देना होना। आमतौर पर वर्तमान मशीनी युग में यह मान लिया गया है कि पशु पालन अलाभकारी कार्य है लेकिन वस्तुतः ऐसा है नहीं।

देश में यदि अधिकाधिक गौ-आधारित जैविक कृषि को सुनिश्चित किया जाय और रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का गोबर-गोमूत्र से बने कंपोस्ट, बायोगैस की स्लरी व जैविक कीटनाशकों से रिप्लेसमेंट किया जाय तो न केवल फसल की गुणवत्ता में वृद्धि होगी बल्कि उत्पादन में भी वृद्धि होगी। क्योंकि जैविक कृषि से भूमि को अतिरिक्त पोषक तत्व प्राप्त होंगे।

इस प्रकार 5 वर्षों में संपूर्ण कृषि गौ-आधारित बनायी जा सकती है। इसके अंतर्गत  सरकार द्वारा बैलों का उपयोग बढ़ाने, उन्नत बैल चालित यंत्रों जैसे बैल चालित ट्रैक्टर, सिंचार्इ पंप, जनरेटर, आटा चक्की, कोल्हू, बैल गाड़ियों आदि के विकास एवं वितरण को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसके लिए डीजल ट्रैक्टर और अन्य उपकरणों पर दिये जाने वाले सरकारी अनुदान को कम करते हुए बैल चालित यंत्रों पर अनुदान की व्यवस्था की जानी चाहिए। गौ-आधारित जैविक कृषि में इनके उपयोग के अतिरिक्त इनसे विभिन्न औषधियों तथा अन्य कर्इ जीवनोपयोगी वस्तुओं का निर्माण किया जा सकता है। देशी गाय के पंचगव्य (गोबर, गोमूत्र, दूध, दही व घी) से निर्मित औषधियों की प्रामाणिकता सिद्ध की जा चुकी है। 

सरकारी उपयोग हेतु अधिक से अधिक पंचगव्य से निर्मित वस्तुओं का क्रय किया जाना चाहिए। बड़े बायोगैस प्लांट स्थापित कर उनसे सीएनजी और विद्युत के उत्पादन को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। 

अगर सस्ता भूसा चारा उपलब्ध हो, जैविक कृषि में गोबर और गोमूत्र का उपयोग हो, पंचगव्य से औषधियां और अन्य जीवनोपयोगी पदार्थ बनाए जाएं, बैलों का बेहतर उपयोग किया जाए तो गौवंश कभी भी आर्थिक दृष्टि से अलाभकारी नहीं है।

…….. पी. कुमार संभव

गोकशी पर प्रतिबंध ज़रूरी

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हिदू धर्म में परंपरा के रूप में गाय को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पूज्य मानने की सोच सदियों से चली आ रही है। कर्इ मंदिरों में कुछ खास धार्मिक अवसरों पर पशुओं की बलि के चलन के बावजूद आम हिंदुओं को गोकशी स्वीकार नहीं। 

माना जाता है कि भारत में मुगलों के आने के बाद मुस्लिम आधिपत्य के दौर में गौमांस खाने का प्रचलन शुरू हुआ और इसके बाद र्इसाइयों ने भी इसे आगे बढ़ाया। जब हिंदू समाज ने गोकशी का विरोध शुरू किया तो समाज में धार्मिक टकराव की स्थितियां बनने लगीं। वहीं एक तथ्य यह भी है कि भारत पशुओं के मांस का दूसरा बड़ा निर्यातक देश भी है। इसलिए यह आशंका जतायी जाती रही है कि अन्य पशुओं के मांस के निर्यात के साथ ही गौवंश के मांस का भी निर्यात होता है लेकिन इस बारे में कोर्इ भी स्पष्टता नहीं है।

देश के अधिकांश राज्यों में जहां गोकशी पर पूर्ण पाबंदी है उन्हीं राज्यों में गुपचुप तौर पर अवैध रूप से गोकशी के मामले भी सामने आते रहते हैं। हिंदुओं से जुडें मुद्दों का समर्थन देने वाली भाजपा जहां गोकशी के विरोध को अपने एजेंडे में शीर्ष पर रखती है वहीं उसके विरोधी दल इस मामले में वोट बैंक के लालच में समाज के ध्रुवीकरण का मौका नहीं चूकते। भाजपा विरोधी दलों में तमाम हिंदू नेता निजी तौर पर गोकशी के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन वे राजनीतिक कारणों से गोकशी पर प्रतिबंध का विरोध करते हैं। ऐसे राजनीतिक दल अल्पसंख्यकों को आकर्षित करने के लिए गोकशी को सही ठहराते हैं। 

एक सच्चार्इ यह है कि गोकशी करने वाले कुछ लोग आर्थिक लाभ के साथ-साथ यह काम इसलिए भी करते हैं क्योंकि वे हिंदू संगठनों की विचारधारा के विरोध में खड़े दिखना चाहते हैं। वे मुस्लिम धर्मगुरुओं की इस सलाह पर अमल के लिए तैयार नहीं होते कि गाय की कुर्बानी से बचें। ऐसे तत्व कानूनी पाबंदी की भी परवाह नहीं करते। 

निःसंदेह औसत मुस्लिम गौवध से परहेज करते हैं, क्योंकि वे भारतीय परंपराओं और हिंदुओं की श्रद्धा का सम्मान करते हैं, लेकिन उनके बीच ही ऐसे लोग भी हैं जो बदले की भावना के तहत गोकशी से परे हटने के लिए तैयार नहीं। उन्हें लगता है कि जिस तरह हिंदू समुदाय मुस्लिमों के कुछ रीति-रिवाजों का विरोध करते हैं उसी तरह उन्हें भी हिंदुओं की परंपराओं का विरोध करना चाहिए, भले ही यह गोकशी के रूप में हो। हो सकता है कि गोकशी कुछ लोगों के लिए आर्थिक दृष्टि से लाभदायक हो अथवा उनके जीवनयापन का जरिया हो, लेकिन यह उचित नहीं कि इसकी आड़ में पूरे हिंदू समुदाय की धार्मिक मान्यताओं की अनदेखी कर दी जाए। ऐसी कोर्इ आर्थिक गतिविधि समाज के हित में नहीं हो सकती, जो दो समुदायों को आमने-सामने खड़ा कर दे। जो धार्मिक मान्यताओं के चलते गोकशी का विरोध कर रहे हैं वे अपनी मान्यता पर कायम ही रहेंगे, लेकिन उन्हें देखना होगा कि सभ्य समाज इसकी इजाजत नहीं देता कि गाय का मांस खाने के शक में किसी की जान ली जाए।

…….. पी. कुमार संभव

मल्टी परपज सचल पशु चिकित्सालय सेवा

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समय पर इलाज न मिल पाने के कारण कई बार पालतू पशुओं की मौत हो जाती है. किसानों की इस दिक्कत को दूर करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ‘मल्टी परपज सचल पशु चिकित्सालय सेवा’ शुरू की है. इस सुविधा के शुरू होने से  एक कॉल करने पर मोबाइल वैन में डॉक्टर दवाइयां लेकर पशु पालकों के घर पहुंचेंगे. हर जिले में इसके नोडल अधिकारी मुख्य पशु चिकित्साधिकारी होंगे. 

स्वास्थ्य विभाग की 108 एंबुलेंस सेवा की तर्ज पर ‘मल्टी परपज सचल पशु चिकित्सालय सेवा’ के तहत मोबाइल वैन चलाई जाएंगी. पशु चिकित्सा मोबाइल वैन प्रदेश के सभी जिलों के हर ब्लाक में एक मोबाइल वैन होगी. इस मोबाइल वैन में एक पशु चिकित्सक, पशुओं की चिकित्सा संबंधी उपकरण और दवाइयां होंगी. इसे एक टोल फ्री नंबर से जोड़ा जाएगा. जरूरत पड़ने पर किसान इस पर फोन कर सकेंगे. 

किसी भी गांव में रहने वाले किसान के फोन करने पर संबंधित ब्लाक की पशु चिकित्सा मोबाइल वैन मौके पर पहुंच जाएगी. मोबाइल वैन में डॉक्टर मौजूद होंगे, जो बीमार पशु का परीक्षण करने के साथ दवाएं भी देंगे. इससे पशुओं को तुरत और सही इलाज मिल सकेगा. उचित समय टीकाकरण न होने से पशु विभिन्न बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं. यह मोबाइल वैन पशुओं के टीकाकरण में भी सहायक होगी. 

गोबर से बना स्टीकर: रेडिएशन दूर करने में सहायक

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मोबाइल रेडिएशन दूर करने के लिए गाय के गोबर से स्वास्तिक, भगवान शिव, गणेश, गौमाता एवं कई प्रकार की आकृति के मोबाइल स्टीकर बनाए जा रहे हैं। यह स्टीकर मोबाइल के पीछे लगाए जाते हैं। दावा है कि गोबर के स्टीकर मोबाइल से निकलने वाली हानिकारण विकिरणों से मोबाइल धारक की रक्षा करने में सहायक होती हैं।

देशभर में क़रीब 500 से ज़्यादा गौशालाओं में यह स्टीकर बनाये जा रहे हैं.

आयुर्वेदिक में भी कहा गया है कि गाय के गोबर में ऐसे गुण हैं जो रेडिएशन से सुरक्षा प्रदान करते हैं.

हालांकि इस दावे का अभी तक ना तो कोई परीक्षण हुआ है और ना ही कोई वैज्ञानिक जांच ही हुई है.

गोबर से कागज़

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मध्यम और लघु उद्योग मंत्रालय की की पहल पर एक खास तकनीक द्वारा गोबर से कागज़ बनाया जा रहा है. सरकार की योजना है कि गोबर से कागज़ बनाने का प्लांट देश के हर हिस्से में लगाया जाएगा. नेशनल हैंडमेड पेपर इंस्टीट्यूट में गाय के गोबर से कागज़ बनाने की प्रक्रिया का सफल परीक्षण किया गया. इस योजना से जुड़ने वाले गोबर से पेपर बनाए जाने वाले प्लांट के लिए सब्सिडी और लोन भी प्राप्त कर सकते हैं.  इस प्लांट को तैयार करने में 5 लाख से लेकर 25 लाख रुपए तक का खर्च आ जाता है. एक प्लांट में 10 से 12 लोगों को रोज़गार दिया जा सकता है और इससे अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सकती है.

एक गाय के पेट से 20 किलो तक निकल रहा प्लास्टिक

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पोस्टमार्टम रिपोर्ट खंगालने और उस पर अध्ययन करने पर पाया गया कि औसतन एक गाय के पेट से 20 किलो तक प्लास्टिक निकला है। जुलार्इ 2017 के बाद से अब तक लगभग छह सौ गायों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन करने पर यह बात सामने आयी है। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों का कहना है इनमें से 90 प्रतिशत गायों की मौत का कारण उनके पेट में जमा प्लास्टिक है। गायों का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि सड़कों पर घूमने वाली गाय सब्जी व अन्य खाने वाले सामानों के साथ उस प्लास्टिक को भी निगल जाती हैं, जिसमें वह खाद्य पदार्थ फेंका जाता है। प्लास्टिक गाय के पेट में जाकर जमा हो जाता है और फिर वह धीरे-धीरे आंतों को जाम कर देता है। एक समय ऐसा आता है जब आंतों में फंसी प्लास्टिक गाय की मौत का कारण बन जाता है। पोस्टमार्टम के दौरान जानवर की आंत को देखना होता है और उससे मौत का कारण पता लगाया जाता है। हर गाय की मौत का कारण प्लास्टिक सामने आ रहा है और पेट से 15 से 20 किलो तक प्लास्टिक निकलता है। इसमें पालीथीन, प्लास्टिक के बोरे, प्लास्टिक की रस्सियों के साथ अन्य खतरनाक कूड़े होते हैं, जो पेट में गलते नहीं हैं। पोस्टमार्टम के दौरान आसपास मौजूद डॉक्टर व पशु स्वास्थ्य कर्मियों को चक्कर आ जाता है। पेट में प्लास्टिक इस तरह फंसा होता है कि उसे निकालने में डॉक्टरों को पसीना छूट जाता है। 

एक गाय आधारित आर्थिक मॉडल

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गो सेवा से जुड़ीं संस्थाओं में हिंगोनिया मवेशी पुनर्वास केंद्र की अपनी अलग विशेषता है. केंद्र का मानना है कि यदि आप ‘एक गाय’ की जान बचा सकते हैं.’ तो ‘गो संरक्षण-संवर्धन’ की कोई समस्या ही नहीं रह जाएगी. 

हिंगोनिया मवेशी पुनर्वास केंद्र ‘गाय और पर्यावरण’ की रक्षा के उद्देश्य से ‘एक गाय आधारित आर्थिक मॉडल’ विकसित कर रहा है. पूरी दुनिया इस मॉडल का अध्ययन कर सकती है और देख सकती है कि गाय और पर्यावरण की सुरक्षा कैसे जुड़ी हुई है. ऐसा करने से एक साथ ‘गाय और पर्यावरण’ की रक्षा की जा सकती है. ‘एक गाय आधारित आर्थिक मॉडल’ किसानों को गाय पालन करने के लिए प्रेरित कर रहा है.

बांग्लादेशी तस्करों के जाल में फँसी गौमाता सालाना 40 हज़ार करोड़ की गौतस्करी

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बांग्लादेश तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है। दोनों देशों के बीच 4,156 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो दुनिया का पांचवां सबसे लंबा बॉर्डर एरिया है। पश्‍चिम बंगाल और असम के कर्इ इलाके जमीन और जलमार्ग से बांग्लादेश से जुड़े हुए हैं। गायों की तस्करी के लिए जल और जमीन दोनों ही रास्तों का इस्तेमाल हो रहा है। पश्‍चिम बंगाल में 2,216 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा के जरिए हर साल बड़ी संख्या में मवेशियों की बांग्लादेश में तस्करी होने का अनुमान है। सीमावर्ती क्षेत्र मालदा-मुर्शिदाबाद के कच्चे रास्ते से रोजाना गायें बांग्लादेश पहुंचती हैं। 

सीबीआर्इ का मानना है कि जिस संख्या में गायों की तस्करी होती है उसमें से केवल पांच फीसदी ही बीएसएफ के जवान रोक पाते हैं। बाकियों की या तो जानकारी कम है या फिर मिलीभगत है। अब सीबीआर्इ इसके पीछे काम करने वाले सिंडिकेट के बीच सांठगांठ का खुलासा करने की कोशिश में है। 

एक समाचार के मुताबिक संदेह के आधार पर सीबीआर्इ ने कर्इ बड़े नाम वालों को गायों की तस्करी में लिप्त होने का अनुमान लगाया है। इनमें से एक नाम तो तृणमूल कांग्रेस के एक नेता का भी है। कहा जाता है कि पशु तस्करी करके इस नेता ने काफी धन बनाया है इसकी जांच भी अब एजेंसी कर रही हैं। 

बांग्लादेश में गायों की कीमत नस्ल और ऊंचार्इ के आधार पर तय होती है। जैसे हरियाणा और यूपी की नस्लें ज्यादा कीमत पर बिकती हैं, जबकि बंगाल की गायों की कीमत अपेक्षाकृत कम है। र्इद के दौरान इनकी मांग बढ़ने से कीमत भी ज्यादा हो जाती है। जब कभी किसी गिरोह द्वारा तस्करी की जा रही गायों को बीएसएफ जब्त करती है और बाद में उनकी नीलामी होती है तो इनकी कीमत जानबूझकर कम लगार्इ जाती है। यह कीमत भी तस्करी में शामिल लोगों द्वारा ही तय की जाती है। साथ ही केवल कुछ ही व्यापारियों को कम कीमत पर इन्हें खरीदने की इजाजत मिलती है। नीलामी के बाद गायों को दोबारा बढ़ी हुर्इ कीमत पर व्यापारी बांग्लादेशी तस्करों को बेच देते हैं। गायों या दूसरे मवेशियों की तस्करी के लिए तस्कर आए दिन नए तरीके अपनाते हैं। लंबा-चौड़ा बॉर्डर होने के कारण उसके चारों ओर बाड़ नहीं लगायी जा सकती और न ही सीमा पर उतनी पक्की चौकसी हो पाती है। इसी बात का फायदा तस्कर उठाते हैं। कर्इ बार गायों को सीमा पार ले जाने के लिए महिलाओं या बच्चों का इस्तेमाल भी होता है क्यों कि उन पर आसानी से शक नहीं किया जाता। लीवर के इस्तेमाल से भी मवेशी सीमा पार भेजे जाते हैं, जिसे झूला तकनीक कहते हैं। ये तकनीक छोटे मवेशियों के लिए इस्तेमाल होती है। साल 2016 में सीबीआर्इ ने इस तस्करी का अनुमानित फायदा लगभग 15 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा माना था। इसके अलावा असम से भी तस्करी होती है। आंकड़ों के लिहाज से भी ये मुद्दा गंभीर दिखता है। साल 2014 में तस्करी करके ले जाए जा रहे करीब एक लाख दस हजार पशुओं को बीएसएफ ने जब्त किया था। साल 2016 तक आते – आते सीमा पर जब्त पशुओं की संख्या एक लाख 69 हजार तक पहुंच गर्इ। जब्ती की इस संख्या से इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि सही मायने में कितने पशुओं की तस्करी हुर्इ। एक बात ये भी है कि बांग्लादेश में पशु तस्करी को अपराध नहीं माना जाता, बल्कि ये वहां की सरकार के लिए राजस्व का जरिया है। भारत का तस्कर बांग्लादेश की सीमा में जाते ही पशुओं के बदले टैक्स चुकाता है और बाकायदा व्यापारी कहलाता है। बांग्लादेश में पशुओं को खरीदकर ज्यादा कीमत पर दूसरे बीफ खाने वाले देशों को भी बेचा जाता है। ये भी वहां आय का एक जरिया है। साथ ही पशुओं से जुड़े चमड़ा उद्योग भी वहां खूब चलते हैं। तो कुल मिलाकर हमारे यहां के मवेशी पड़ोसी देश की जीडीपी में योगदान दे रहे है। 

भारत से गायों की तस्करी को लेकर सीबीआर्इ ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि देश के गायों की खेप की खेप बांग्लादेश सीमा के जरिए बाहर पहुंचायी जा रही हैं। यहां तक कि इस तस्करी में बीएसएफ और कस्टम वालों के अलावा कर्इ सफेद पोश लोगों की मिलीभगत बतायी जा रही है। 

एक प्रमुख समाचार पत्र में छपी रिपोर्ट के अनुसार भारत-बांग्लादेश सीमा पर गौतस्करी का धंधा सालाना 35-40 हजार करोड़ रुपये का है। भारत में जिस गाय की कीमत 20 हजार होती है बॉर्डर पार करवाते ही बांग्लादेश में वह औसतन 50 हजार में बिकती है ।

देश के तीन राज्यों में 55 फीसदी बूचड़खाने

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देश के तीन राज्यों – तमिलनाडु, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में सबसे अधिक बूचड़खाने हैं. पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) इंडिया के आंकलन पर गौर करें तो देश में अवैध बूचड़खानों की संख्या अभी भी 30,000 से ज्यादा होने का अनुमान है। जबकि सूचना का अधिकार (आरटीआर्इ) के जरिये पता चला है कि देश में मात्र 1,707 बूचड़खाने ही पंजीकृत हैं

सबसे अधिक पंजीकृत बूचड़खाने वाले सूबों की फेहरिस्त में क्रमशः तमिलनाडु, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र शीर्ष तीन स्थानों पर हैं, जबकि अरुणाचल प्रदेश और चंडीगढ समेत आठ राज्यों में एक भी बूचड़खाना पंजीकृत नहीं है। मध्यप्रदेश के नीमच निवासी आरटीआर्इ कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ को भारतीय खाद्य संरक्षा एंव मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआर्इ) ने ये आंकड़े फूड लायसेंसिंग एंड रजिस्ट्रेशन सिस्टम के जरिये उपलब्ध जानकारी के आधार पर प्रदान किए हैं। आरटीआर्इ के तहत मुहैया कराये गये इन आंकड़ों की रोशनी में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में कितनी बड़ी तादाद में अवैध बूचड़खाने चल रहे हैं।

आरटीआर्इ अर्जी पर भेजे जवाब में एफएसएसएआर्इ के एक अफसर ने बताया कि अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दादरा व नगर हवेली, दमन व दीव, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा में एक भी बूचड़खाना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत पंजीकृत नहीं है। आरटीआर्इ से मिली जानकारी यह चौंकाने वाला खुलासा भी करती है कि आठों राज्यों में ऐसा एक भी बूचड़खाना नहीं है जिसने केंद्रीय या राज्यस्तरीय लायसेंस ले रखा हो। एफएसएसएआर्इ ने आरटीआर्इ के तहत बताया कि तमिलनाडु में 425, मध्यप्रदेश में 262, और महाराष्ट्र में 249 बूचड़खाने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत पंजीकृत हैं। यानी देश के कुल 55 फीसदी बूचड़खाने इन्हीं तीन सूबों में चल रहे हैं। 

उत्तर प्रदेश में अवैध पशुवधशालाओं के खिलाफ सरकार की कार्रवार्इ चर्चा में है जबकि प्रदेश में महज 58 बूचड़खाने ही पंजीकृत हैं। आंध्रप्रदेश में 1, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 9, असम में 51, बिहार में 5, छत्तीसगढ में 111, दिल्ली में 14, गोवा में 4, गुजरात में 4, हरियाणा में 18, हिमाचल प्रदेश में 82, जम्मू कश्मीर में 23, झारखंड में 11, कर्नाटक में 30, केरल में 50, लक्षदीप में 65, मणिपुर में 4, और मेघालय में एक बूचड़खाने को खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत पंजीकृत किया गया है।

ओडिसा में 5, पुडुचेरी में 2, पंजाब में 112, राजस्थान में 84, और उत्तराखंडृ में 22 और पश्चिम बंगाल में 5 बूचड़खाने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत पंजीकृत हैं। एफएसएसएआर्इ ने आरटीआर्इ के तहत यह भी बताया कि देशभर में 162 बूचड़खानों को प्रदेश स्तरीय लायसेंस मिले हैं, जबकि 117 पशुवधशालाओं को केंद्रीय लायसेंस हासिल है। इस बीच पशुहितैषी संगठन पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) इंडिया की विज्ञप्ति में मोटे आंकलन के हवाले से कहा गया है कि देश में अवैध या गैरलाइसेंसी बूचड़खानों की संख्या 30,000 से ज्यादा है।

हालांकि, कर्इ लायसेंसशुदा बूचड़खानों में भी पशुओं को बेहद क्रूरतापूर्वक जान से मारा जाता है। पेटा इंडिया ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से अनुरोध किया है कि वे ऐसी पशुवधशालाओं को बंद कराएं जिनके पास उपयुक्त प्राधिकारणों के लायसेंस नहीं है और जो कानून द्वारा निषिद्ध तरीकों का इस्तेमाल करते हैं।