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जैविक खेती से बदल रही किसानों की तकदीर

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अडानी फाउंडेशन का मिल रहा सहयोग

जैविक खेती का महत्व भारत के किसानों से ज्यादा और कोई नहीं समझ सकता है। भारत में हजारों वर्षों से चली आ रही ऑर्गेनिक खेती को तब झटका लगा जब बढ़ती जनसंख्या और मौसम में बदलाव के चलते लोगों तक खाद्य वस्तुओं की तेजी से आपूर्ति करने के लिए खेती में रासायनिक उर्वरक, केमिकल्स, कीटनाशक और कई जहरीली वस्तुओं का इस्तेमाल होना शुरू कर दिया गया।

इन वस्तुओं के इस्तेमाल से न सिर्फ इंसानों की सेहत पर असर पड़ा बल्कि इससे वातावरण को भी काफी नुकसान पहुंचा। इन्हीं सब कारणों की वजह से लोगों का ध्यान एक बार फिर से जैविक खेती की ओर आकृष्ट होना शुरू हुआ है। लेकिन किसानों के पास जैविक खेती से जुड़ी ज्यादा जानकारी उपलब्ध न होने के कारण उन्हें कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। किसानों की इस परेशानी को दूर करने के लिए अडानी फाउंडेशन अपनी महती भूमिका निभाते हुए गोंदिया और आसपास के जिलों के किसानों को गौ आधारित शून्य बजट जैविक खेती के लिए  न केवल न केवल प्रोत्साहित कर रहा है वरन उन्हें नागपुर के देवलापार स्थित गौ-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र भेजकर उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था भी कर रहा है। 

एक मुलाकात में अडानी फाउंडेशन के सीएसआर हेड नितिन शिरालकर ने जैविक खेती के महत्त्व के बारे में बताते हुए कहा कि पारम्परिक रासायनिक खेती ने न केवल हमारे स्वास्थ्य को ख़राब कर दिया है, बल्कि इसने मिटटी के स्वास्थ्य को भी ख़राब कर दिया है। भूमि की उर्वरा शक्ति का पूरी तरह से ह्रास हो चुका है, इससे बचने का एकमात्र उपाय जैविक खेती है।

नितिन शिरालकर ने बताया कि अडानी फाउंडेशन की ओर से किसानों को जैविक खेती करने के लिए प्रोत्साहित किये जाने का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि आसपास के गांवों के किसानों को हम देवलापार अनुसन्धान केंद्र में भेजकर उन्हें गौमूत्र से विभिन्न जैविक उर्वरक और फसलों की सुरक्षा के लिए जैविक कीटनाशक बनाने का प्रशिक्षण देते हैं। उन्होंने बताया कि फाउंडेशन के सहयोग से अबतक लगभग ढाई हजार से भी अधिक किसानों ने प्रशिक्षण लिया है। प्रशिक्षित किसानों द्वारा शून्य लगत के बावजूद अधिक उपज प्राप्त करता देखकर अगल-बगल के अन्य किसान भी गौ आधारित जैविक खेती की ओर उन्मुख हो रहे हैं।

नितिन शिरालकर ने जैविक खेती के फायदे बताते हुए कहा कि जैविक खेती करने पर भूमि, जल और वायु प्रदूषण बहुत कम होता है। इसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थों, कीटनाशकों और केमिकल फर्टिलाइजर्स का इस्तेमाल नहीं होता है इसलिए पौष्टिक और जहर मुक्त भोजन का उत्पादन होता है। जैविक खेती करने पर मिट्टी के पोषण को भी बढ़ावा मिलता है और इससे मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार होता है। यह किसानों के लिए काफी लाभदायक होता है क्योकि इसमें पानी का इस्तेमाल बहुत कम होता है। जैविक खेती ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के कई अवसर प्रदान करता है जिससे किसानों और मजदूरों की आर्थिक हालातों में भी सुधार होता है।

विदेशी नस्ल की गायों ने बनाया कर्जदार, देसी गायों ने कर्ज से उबारा

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महाराष्ट्र के भंडारा जिले में डेयरी का व्यवसाय करने वाले एक किसान को विदेशी नस्ल की गायें रखना भारी पड़ गया। 15 दिन बाद ही दूध उत्पादन गिरकर 250 लीटर प्रतिदिन से 50 से 60 लीटर प्रतिदिन हो गया। बैंक का व्याज बढ़ने लगा तो हताश होकर किसान ने देसी गौवंश का पालन शुरू किया और गोमूत्र और गोबर से उत्पाद तथा जैविक खाद बनाकर आज लाखों रूपये महीने कमा रहा है।

जिले के तुमसर तालुका स्थित सिंदपुरी गांव निवासी पवन काटनकर ने बैंक से भारी कर्ज लेकर डेयरी का व्यवसाय शुरू किया। बैंक के लोन से मिले पैसे से उन्होंने विदेशी नस्ल की दुधारू गायें खरीदी, जिनसे प्रतिदिन 250 से 300 लीटर दूध प्राप्त हो रहा था लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिन तक नहीं रही। पवन काटनकर ने बताया कि महज 15 दिन बाद ही दुग्ध उत्पादन गिरकर 50 से 60 लीटर हो गया। अचानक कुछ दिन बाद ही गायें भी बीमार होकर मरने लगीं। डॉक्टर के बताये सारे उपाय बेकार साबित हो रहे थे। इन सबसे पवन हताश हो चुके थे। उसी समय उन्हें देवालापार के गौविज्ञान अनुसन्धान केंद्र के बारे जानकारी मिली तो वहां जाकर पवन ने एक सप्ताह का प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण  के साथ ही उन्हें वहां से 5 देसी नस्ल की गायें और गौवंश भी प्रदान किये गए जिनके गोबर से पवन ने सर्वप्रथम केचुआ खाद तैयार किया जिसे आसपास के जैविक खेती करने वाले किसानों ने हाथों हाथ खरीद लिया। गोबर जैसे अपशिष्ट पदार्थ सें होने वाली आय ने पवन को उत्साह से भर दिया और फिर उन्होंने अपने खुद के स्वप्नपूर्ति नामक ब्रांड से उत्पाद तैयार करना शुरू किया। आज यह ब्रांड गौ आधारित उद्योग का एक पर्याय बन चूका है।

केमिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर नौकरी की बजाय गौ आधारित उद्योग चला रहे पवन के हमें बताया कि दूध की अपेक्षा दूध से निर्मित अन्य पदार्थ जैसे दही, पनीर, घी, खोआ, इत्यादि से अधिक आय अर्जित हो जाती है। तुमसर और भंडारा शहरों में 1 लीटर और 0.5 लीटर के पैक में दूध घरों में सप्लाई करते हैं। आर्डर पर अन्य उत्पाद भी सप्लाई करते हैं। लेकिन पवन का कहना है कि सबसे अधिक लाभ गाय के गोबर से तैयार वर्मी कम्पोस्ट यानी कि केचुआ खाद से होती है। उन्होंने बताया कि 8000 रूपये प्रति टन के भाव से वर्मी कम्पोस्ट खाद की विक्री हो जाती है। महीने में 10 से 15 टन वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो जाती है। वर्तमान में पवन के पास दर्जनभर से अधिक भारतीय नस्ल की उन्नत किस्म की गायें और गौवंश हैं, जिनके गोबर और गौमूत्र से कई अन्य उत्पाद भी बनाये जा रहे हैं जिनमें फर्श क्लीनर, हैण्डवाश, बर्तन धोने का लिक्विड, धूपबत्ती, मच्छरमार अगरबत्ती, और दंतमंजन मुख्य हैं।

पवन का कहना है कि विदेशी नस्ल की गायों ने मुझे कर्जदार बना दिया था, लेकिन देसी नस्ल की गायों ने न केवल कर्ज से मुक्ति दिला दी बल्कि आज मेरी आमदनी लाखों रुपये महीने की हो गई है।   

किसानों के लिए वरदान है देवलापार का गौ-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र

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गाय भारत की संस्कृति और समृद्धि की रीढ़ है – सुनील मानसिंगका

भारतीय नस्ल की गायों को बचाने और गौवंश अधारित जीविका से लगायत मानव सहित सम्पूर्ण प्रकृति की रक्षा के लिए प्रयत्नशील नागपुर के देवलापार स्थित गौ-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र आज गौपालन और जैविक खेती करने के इच्छुक किसानों  के लिए वरदान बना हुआ है। यहाँ देश के विभिन्न क्षेत्रों से आकर किसान गौ आधारित शून्य लागत कृषि का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। साथ ही अदुग्धा गाय के पालन से कैसे अपनी आर्थिक उन्नति कर सकते हैं इसका भी प्रशिक्षण लेकर गोपालन का कार्य कर रहे हैं। इस केंद्र के समन्वयक हैं – श्री सुनील मानसिंगकाजी, जिनके दिशा-निर्देश में यह केंद्र गायों के अपशिष्ट का वाणिज्यिक उपयोग करने का प्रशिक्षण भी किसानों को देता है।

गौ अपशिष्ट से उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण लेने वाले इच्छुक किसानों को देसी गायें और गौवंश केंद्र द्वारा दिए जाते हैं। कत्लखानों से बचाकर लायी गयी जिन गायों और गौवंशों का पोषण केंद्र की गौशाला में किया जाता है, उन्हीं गायों को किसानों को मुफ्त में दिया जाता है जिनकी जानकारी समय-समय पर केंद्र द्वारा ली जाती रहती है। हालाँकि केंद्र की अन्य दो और गौशालाओं में लगभग 800 गौवंश आश्रय पा रहे हैं, जिनसे दूध के अतिरिक्त गोबर और गोमूत्र भी प्राप्त होता है। प्राप्त गोबर से केंद्र में ही वर्मी कम्पोस्ट (केचुआ खाद) बनायी जाती है, जिसका उपयोग खेतों में जैविक खाद के रूप में किया जाता है। तथा गोमूत्र से अर्क और अन्य आयुर्वेदिक औषधियां बनायी जाती हैं। नागपुर के आसपास मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सीमांत जनपदों के लाखों किसान देवलापार से गौ आधारित जैविक खेती का प्रशिक्षण ले चुके हैं। ये किसान पंचगव्य से जैविक खाद और कीटनाशक आदि घर पर ही बनाकर खेती में उपयोग करते हैं। इससे उनकी लागत शून्य हो जाती है और बेहतर उपज प्राप्त होती है। साथ ही देसी गाय के गोबर से अनेक उत्पाद जैसे गमले, धूपबत्ती, दीपक, दंतमंजन आदि तथा गोमूत्र से अर्क, फर्श क्लीनर, हैंडवाश तथा बर्तन धोने का लिक्विड आदि बनाकर अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।

गौ– विज्ञान अनुसंधान केंद्र के समन्वयक श्री सुनील मानसिंगका गौ-आधारित जैविक खेती करने के लिए कई बड़ी कंपनियों के सहयोग से आस पास के जनपदों के किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। उन्होंने जैविक खेती के क्षेत्र में कई बड़ी उपलब्धियां हासिल करते हुए यह साबित किया है कि रासायनिक उर्वरक आधारित खेती की तुलना में जैविक खेती से अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है और मिट्टी की उर्वरता में सुधार करने में गौ-आधारित जैविक खेती बहुत लाभदायक है। एक मुलाकात में सुनील मानसिंगकाजी ने गाय को भारत की संस्कृति और समृद्धता की रीढ़ बताते हुए कहा कि गाय की रक्षा से ही संस्कृति की रक्षा हो सकती है। उन्होंने पंचगव्य, गोबर खाद, केचुआ खाद, अमृत पानी, कामधेनु कीट नियंत्रक और गोबर गैस से होने वाले लाभ और जैविक खेती पर विस्तृत जानकारी भी दी। मानसिंगकाजी फिलहाल देश के कई विश्वविद्यालयों सहित अनेक गौ-सेवी संस्थानों के साथ गौ-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र की अनुसंधानात्मक गतिविधियों का समन्वय कर रहे हैं।

केंद्र में पञ्चगव्य आधारित खेती के कई प्रयोग सफल हो रहे हैं। इसके अलावा गौमूत्र के चिकित्सकीय उपयोग को भी साबित किया गया है। केंद्र में सुप्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्यों की देखरेख में पंचगव्य आधारित आयुर्वेदिक औषधियों का निर्माण भी किया जाता है। 

गौ आधारित जैविक खेती करनेवाले किसानों ने रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्परिणामों के बारे में बताते हुए कहा कि जैविक विधि से खेती में उत्पन्न फसलों की गुणवत्ता तो अच्छी होती ही है साथ ही शून्य लगत पर उपज भी अधिक प्राप्त होती है। 

गौसेवा और गौचर विकास बोर्ड

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“चलो गाय की ओर … चलो गांव की और … चलो प्रकृति की और …”, भारतीय संस्कृति की इस अवधारणा को साकार करने के उद्देश्य से गुजरात सरकार ने ‘गौसेवा और गौचर विकास बोर्ड’ का गठन किया है। 

“गौसंवर्धनम … राष्ट्रवर्धनम” के आदर्श वाक्य को साकार करते हुए गौरक्षा, गोपालन, गौसंवर्धन और गाय आधारित सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक उत्थान का कार्य किया जा रहा है।

उद्देश्य और कार्य

पशु की अवैध हत्या को रोकने के लिए राज्य में कार्यरत विभिन्न संगठनों के साथ समन्वय स्थापित करना।

गोहत्या को रोकने के लिए कानूनों को सख्ती से लागू करना।

गौ सेवा विकास कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन।

गाय आधारित जैविक खेती को बढ़ावा देना। विभिन्न गौशालाओं को मार्गदर्शन प्रदान कर आत्मनिर्भर बनने में मदद करना।

पंचगव्य से आर्थिक आय बढ़ाने के लिए विभिन्न परियोजनाओं का समर्थन करना।

गोमूत्र से औषधीय और कीटनाशकों और अन्य उत्पादों को बढ़ावा देना।

गायों के आर्थिक मूल्य को बढ़ाने के लिए अनुसंधान में मदद करना।

गौ रक्षा, गौ पालन और गौ प्रजनन को बढ़ावा देने के अभियान को तेज करना। 

विश्वविद्यालय स्तर पर गायों पर अनुसंधान और पीएचडी कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।

स्कूली पाठ्यपुस्तकों में “गाय विज्ञान” विषय को शामिल करना।

गोवंश के बारे में जागरूकता फैलाना – स्कूल और कॉलेज के छात्रों के लिए ‘गाय विज्ञान’ परीक्षा आयोजित करना।

आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए पंचगव्य आधारित ग्रामीण कुटीर उद्योग, संगोष्ठियों, कार्यशालाओं, सम्मेलनों, व्याख्यान श्रृंखलाओं, मीडिया शो, पत्रिकाओं और गौकथा (उपदेश) के माध्यम से जागरूकता कार्यक्रम।

देशी पशु प्रजातियों जैसे गिर, कंकरेज, डांगी, शाहीवाल आदि के महत्व को स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों को प्रोत्साहित करना।

Website : https://gauseva.gujarat.gov.in

पंजाब गौ सेवा आयोग

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पंजाब सरकार ने राज्य में गाय संरक्षण और कल्याण सुनिश्चित करने के लिए पंजाब गौ सेवा आयोग का गठन किया है। गाय भारतीय संस्कृति और अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है। हमारे समाज में गाय के लिए विशेष सम्मान है और इसे मां के रूप में सम्मानित किया जाता है।  

पंजाब गौ सेवा आयोग सरकार के पशुपालन, मत्स्य पालन और डेयरी विकास विभाग की अधिसूचना संख्या 32/70/2009-एएच-1(4)/130, दिनांक 09-01-2015 के तहत पंजाब गौ सेवा आयोग अधिनियम, 2014 के तहत गठित किया गया 

अभिप्राय और उद्देश्य 

• आवारा पशुओं के लिए जिला स्तर पर पशुशाला का निर्माण।

• मौजूदा गौशालाओं का सुदृढ़ीकरण।

• विभिन्न शहरी स्थानीय निकायों के अंतर्गत गौ कल्याण के लिए गाय-उपकर (टैक्स) का उचित उपयोग सुनिश्चित करना।

• पंजीकरण, उचित पर्यवेक्षण और संस्थानों के निरीक्षण द्वारा किसी भी संस्था द्वारा बिनदुधारू, कमज़ोर, असहाय और वृद्ध गायों का उचित प्रबंधन और देखभाल सुनिश्चित करना।

• गाय के स्वास्थ्य को बढ़ावा देना, पशुपालन विभाग के माध्यम से गाय के कल्याण और विकास के लिए विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन। सभी उप निदेशकों, वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारियों और पशु चिकित्सा अधिकारियों को उनके संबंधित क्षेत्रों में पशु कल्याण अधिकारी के रूप में नामित किया गया है।

• पुलिस विभाग ने गोहत्या और तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए जिला स्तरीय गौ संरक्षण प्रकोष्ठों का गठन किया है। जिला स्तर पर पुलिस विभाग में स्थापित गौ रक्षा प्रकोष्ठों के सक्रियकरण एवं सुदृढ़ीकरण एवं निष्पादन की निगरानी द्वारा गोहत्या एवं तस्करी को नियंत्रित करना।

• गोचर भूमि को अवैध अतिक्रमण से मुक्त कराने का प्रयास करना ताकि उनका उपयोग गाय कल्याण के लिए किया जा सके।Website : http://pgsc.org.in

हरियाणा गौ सेवा आयोग

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हरियाणा राज्य में गायों के संरक्षण और संवर्धन के लिए हरियाणा राज्य गौ सेवा अधिनियम, 2010 की धारा 3 के तहत ‘हरियाणा गौ सेवा आयोग’ की स्थापना की गई है.

आयोग का मुख्य उद्देश्य है गायों के वध और उनके प्रति हो रही क्रूरता को रोकना तथा इस संबंध में कानूनों के उचित कार्यान्वयन के लिए काम करना. 

अधिक जानकारी के लिए websaite देखें. 

https://hargauseva.gov.in/hi/

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग

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गौ संरक्षण – संवर्धन के लिए राष्ट्रीय कामधेनु आयोग की स्थापना की गई है.  केंद्र सरकार ने 6 फरवरी, 2019 को राष्ट्रीय कामधेनु आयोग की स्थापना की थी. यह आयोग मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत आता है. 

आयोग का प्रमुख काम पशुओं की विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण और संवर्धन के अलावा गाय और बछड़ों की हत्या को रोकना है. 

आयोग के कार्यों में गाय, गोबर और गौमूत्र के कारोबारी इस्तेमाल को बढ़ावा देना भी शामिल है.

आयोग का मानना है कि गाय केवल दूध देने वाली पशु ही नहीं है बल्कि, चार पैरों पर चलता-फिरता पूरा विज्ञान है. 

आयोग गाय के विज्ञान को बढ़ावा देने और गाय की उपयोगिता के प्रचार-प्रसार पर काम कर रहा है. 

Website : http://kamdhenu.gov.in

गौ सेवा आयोग

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गायों के संरक्षण और संवर्धन के लिए केंद्र और विभिन्न  राज्य सरकारों ने ‘गौ सेवा आयोग’ की स्थापना की है.  जिसका उद्देश्य गायों के वध और क्रूरता के निषेध के संबंध में कानूनों के उचित कार्यान्वयन के लिए काम करना है। इसके अलावा गौ संवर्धन के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं बनाना और उन्हें लागू कराना.  

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग  

http://kamdhenu.gov.in/

हरियाणा गौ सेवा आयोग

https://hargauseva.gov.in/hi/

मध्यप्रदेश गौ सेवा आयोग

http://www.home.mp.gov.in/hi/madhaya-paradaesa-gaausaevaa-ayaoga-naiyama-1995

छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग

http://agriportal.cg.nic.in/ahd/PDF/Hindi/Gauseva_Aayog/gauseva_whoiswho_hi.htm?13082020

पंजाब गौ सेवा कमीशन 

http://pgsc.org.in/

गुजरात : गौ सेवा और गोचर विकास बोर्ड 

https://gauseva.gujarat.gov.in/

हिमाचल प्रदेश

गौ सेवा आयोग

http://www.hpagrisnet.gov.in

/hpagris/AnimalHusbandry/

Default.aspx?SiteID=3&PageID=1458

राजस्‍थान

गौपालन निदेशालय

https://gopalan.rajasthan.gov.in/
https://animalhusbandry.rajasthan.gov.in/

शून्य लागत प्राकृतिक खेती किसानों के लिए वरदान

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शून्य लागत प्राकृतिक खेती छोटे और सीमांत किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि वर्तमान में खेती के लिए रसायनों आदि की भारी कीमत चुकाने के लिए किसानों को कर्ज का सहारा लेना पड़ता है और फिर कर्ज का यह बोझ बढ़ता ही जाता है। किसान रासायनिक खाद, कीटनाशक और पेस्टीसाइड के प्रयोग से न केवल कर्ज में डूब रहा है बल्कि खेतों में जहर की खेती कर रहे हैं। अनाज और सब्जियों के माध्यम से यही जहर हमारे शरीर में जाता है।

इस मशीनी युग में खाद्य पदार्थों को उगाने के लिए प्रयोग हो रही रासायनिक खाद और कीटनाशकों से खाद्य सामग्री भी जहरीली होने लगी है। देश में कृषि को बढ़ावा देने के नाम पर लंबे अर्से से प्रयोग हो रहे रसायनों से जहरीली हो रही धरती अब अपनी उपजाऊ शक्ति भी खोने लगी है। तथ्य है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत की कृषि संस्कृति को तबाह किया है।

यहां के कृषि अनुसंधान केंद्रों की सूझबूझ को धता बताकर अपने हाइब्रिड बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशकों का व्यापार बढ़ाने के लिए पंख फैलाए हैं। किसान-जीवन को इस क्रूरता का शिकार बनाया है, परंपरागत बीज संरक्षण और उर्वरक तैयार करने की पद्धति को रोककर कृषि उपादानों के लिए उन्हें पराश्रित बनाया है। अमेरिका की वालमार्ट और मोसेंटो कंपनियों की विषाक्त सांसों से झुलसे हुए भारतीय कुटीर उद्योग और लघु व्यवसाय के कारण भारत की लोककला, पारंपरिक हुनर वगैरह तो आहत हुए ही है, यहां की संस्कृतियों पर भी इसका घातक हमला हुआ। अब कृषि कर्म को भी पंगु बनाने की निरंतर कोशिश चल रही है। ऐसे विषम एवं जटिल हालातों में गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत के प्रयासों एवं प्रयोगों से न केवल प्राकृतिक खेती एवं जीरो बजट खेती को बल मिल रहा है, भारतीय कृषि अनूठा एवं विलक्षण करते हुए भारत की अर्थ-व्यवस्था के लिये संबल बन रही है।

धरती को रसायनों से मुक्ति दिलाने और देश के नागरिकों को शुद्ध खाद्यान्न पदार्थ उपलब्ध करवाने की दृष्टि से शून्य लागत प्राकृतिक खेती एक बड़ा विकल्प बनकर उभरी है। आजादी बचाओ आंदोलन के संस्थापक स्व. राजीव दीक्षित ने 90 के दशक में देसी गाय को भारत के हरेक घर की आर्थिक समृद्धि, प्राकृतिक खेती एवं गो-संरक्षण का आधार बताते रहे हैं, इसी तरह प्राकृतिक खेती के सूत्रधार महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर जीरो बजट खेती का अभियान चलाते हुए भारतीय कृषि को उन्नत बनाते रहे हैं, इन अभियानों को गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत एक आंदोलन की तरह आगे बढ़ा रहे हैं। उनके प्रयासों से हिमाचल प्रदेश के बाद अब गुजरात में कृषि की नयी फिजाएं आकार ले रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राज्यपालों के सम्मेलन में उनके प्राकृतिक खेती एवं उन्नत जीवनशैली के प्रयासों की सराहना करते हुए देश के सभी राज्यों में इन्हें लागू करने को कहा है।

हिमाचल प्रदेश के 30 हजार से अधिक किसान अब शून्य लागत प्राकृतिक खेती कर रहे हैं, जबकि दक्षिण भारत में भी 50 लाख किसान इसे अपना चुके हैं। पूरे भारत में जैविक खेती अपनाने वाले सिक्किम राज्य ने भी अब शून्य लागत प्राकृतिक खेती अपनाने की योजना पर काम शुरू कर दिया है क्योंकि जैविक खेती से सिक्किम का खाद्यान्न उत्पादन बहुत कम हो गया है, जबकि शून्य लागत प्राकृतिक खेती से उत्पादन ज्यादा होता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी आचार्य देवव्रत के रसायन मुक्त खेती के मंत्र को अपना लिया है। गोपालन व देशी नस्ल की गायों को अपनाने एवं गोबर एवं गोमूत्र से प्राकृतिक खेती के उनके अभियान के भी अनूठे परिणाम सामने आये हैं। क्योंकि केवल देसी गाय पर आधारित इस प्राकृतिक खेती को करने में कोई लागत नहीं आती है। किसान गाय के गोबर और मूत्र से ही खेत के लिए जरूरी पोषक तत्वों की जरूरत को पूरा करता है। वहीं गाय के गोबर और मूत्र में लस्सी व गुड़ आदि मिलाकर किसान खेत में ही प्राकृतिक कीटनाशक भी तैयार कर सकता है।

दूसरा, जैविक खेती की तुलना में प्राकृतिक खेती काफी सरल और फायदेमंद है क्योंकि एक देसी गाय से लगभग 30 एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खेती की जा सकती है। जबकि जैविक खेती के लिए एक एकड़ क्षेत्र में करीब 20 पशुओं के गोबर की जरूरत पड़ती है। 

शून्य लागत प्राकृतिक खेती छोटे और सीमांत किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है क्योंकि वर्तमान में खेती के लिए रसायनों आदि की भारी कीमत चुकाने के लिए किसानों को कर्ज का सहारा लेना पड़ता है और कर्ज का यह बोझ बढ़ता ही रहा है। 

यदि हमें अपने परिवार, समाज को स्वस्थ रखना है तो हमें प्राकृतिक खेती की ओर लौटना होगा। गाय से प्राप्त सप्ताह भर के गोबर एवं गौमूत्र से निर्मित घोल का खेत में छिड़काव खाद का काम करता है और भूमि की उर्वरकता का हृास भी नहीं होता है। इसके इस्तेमाल से एक ओर जहां गुणवत्तापूर्ण उपज होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत लगभग शून्य रहती है। राजस्थान के एक प्रयोगधर्मी किसान ने अपने खेत में प्राकृतिक खेती कर उत्साहवर्धक सफलता हासिल की है। इससे पहले वह रासायिक एवं जैविक खेती करता था, लेकिन देसी गाय के गोबर एवं गोमूत्र आधारित जीरो बजट वाली प्राकृतिक खेती कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही है।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती की प्रक्रिया जैविक खेती से भिन्न है तथा ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडल में आने वाले बदलाव का मुकाबला एवं उसे रोकने में सक्षम है। इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाला किसान कर्ज के झंझट से भी मुक्त रहता है, वहीं उन्नत कृषि उत्पादों से आम जनजीवन को स्वस्थ जीवन प्रदत्त करता है।

भारत के संदर्भ में जैविक खेती का महत्व

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खेती के पारम्परिक तरीके को अपनाकर भूमि सुधार कर उसे पुनर्जीवित करने का स्वच्छ तरीका जैविक खेती है। इस पद्धिति से खेती करने में रासायनिक उर्वरकों, सिंथेटिक कीटनाशकों तथा प्रतिजैविक पदार्थों का उपयोग वर्जित होता है। इनके स्थान पर किसान स्थानीय उपलब्धता के आधार पर फसलों द्वारा छोड़े गए बायोमास का उपयोग करते हैं, जो भूमि की गुणवत्ता बढ़ाने के साथ-साथ भूमि की उर्वरता शक्ति बढ़ाने का भी काम करता है.

आर्गेनिक वर्ल्ड रिपोर्ट 2021 के आधार पर वर्ष 2019 में विश्व का 72.3 मिलियन हेक्टयर क्षेत्र जैविक खेती हेतु उपयोग में लिया गया, जिसमें एशिया का 5.1 मिलियन हेक्टयर क्षेत्र भी शामिल है। भारत में भी पिछले कुछ वर्षों में जैविक खेती से वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण अधिक रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों से होने वाला दुष्प्रभाव है, जिसने भारत सरकार को इस दिशा में विचार करने के लिए प्रेरित किया। 

अतः सरकार द्वारा जैविक खेती को बढ़ावा देने हेतु किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप 2019 में जैविक खेती का क्षेत्रफल 22,99,222 हेक्टयर हो गया है। हालांकि आज भी यह रासायनिक कृषि क्षेत्र के अनुपात का महज 1.3 प्रतिशत है। इसका मुख्य कारण बढ़ती हुई जनसंख्या को खाद्यान्न आपूर्ति के लिए रासायनिक खेती की दक्षता है, जोकि उसके द्वारा प्राप्त उत्पाद की मांग को बढ़ावा दे रहे हैं। किन्तु इन उत्पादों अथवा फसलों के उत्पादन में उपयोग होने वाले रासायनिक खाद एवं कीटनाशक की बढ़ती मात्रा दूरगामी दुष्प्रभाव का संकेत है, जिन्हें शुरुआत में नजरअंदाज किया गया.

जैविक खेती इन प्रभावों को कम करने का एक बेहतर विकल्प है। जैविक खेती के अंतर्गत मुख्यतः खाद्दान फसलें, दलहन, तिलहन, सब्जियां तथा बागवानी वाली फसलों का उत्पादन किया जा रहा है। जैविक खेती का बढ़ाता प्रचलन मुख्यतः उपभोक्ता की मांग पर आधारित होता है। उपभोक्ता की मांग मुख्यतः खाद्य उत्पाद की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। खेती में बढ़ते रसायनों का उपयोग तथा उनके कुप्रभाव, दूरगामी स्तर पर उपभोक्ता में अविश्वास का कारण बन रहे हैं। इस आधार पर इनके कुछ निम्न कारण संभव है –

• अधिक मात्रा में रासायनिक खाद्यों एवं कीटनाशकों का उपयोग करना। 

• बढ़ते रसायनो के कारण मिटटी, जल तथा वायु दूषित होती जा रही है। 

• मानव स्वास्थ पर इसका विपरीत प्रभाव हो रहा है। 

जैविक खेती से उत्पन्न खाद्य उत्पादों की विदेशों में बढ़ती मांग भी इसके महत्त्व को प्रदर्शित करती है। वर्ष 2019-20 में भारत से जैविक खाद्य उत्पाद का कुल निर्यात 6.39 लाख मैट्रिक टन रहा, जिसका मूल्य लगभग ४६८६ करोड़ रूपए आंका गया। यह उत्पाद मुख्यतः ऑस्ट्रेलिया, जापान, कनाडा, न्यूज़ीलैंड, स्विट्ज़रलैंड, इज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात  तथा वियतनाम जैसे देशो में निर्यात हो रहे हैं। इनके आलावा भी जैविक खेती की महत्ता के कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं – 

• जैविक खाद्य उत्पादन की जीवन अवधि का अधिक होना। 

• जैविक फसलों की परिपक्क्वता में अधिक समय होता है जिससे वे अधिक पोषण ले पाते हैं एवं स्वादिष्ट भी होते हैं। 

• जैविक फसलों का प्रचलन जीव विविधता को संतुलित रखने के साथ भूमि की उर्वरता को भी बनाए रखता है। 

रासायनिक खाद्यों का उपयोग न करने से पारम्परिक खेती में होने वाला ऊर्जा क्षय भी लगभग 25-30 प्रतिशत तक घट जाता है। 

जैविक खेती के घटक

• इनमें मुख्यतः बिना उपचार के बीजों के उपयोग किया जाता है, अथवा जैविक खाद से इन्हे उपचारित किया जाता है। 

• जैविक खाद्य में मूल रूप से गोबर की खाद, जानवरों द्वारा निष्कासित मल-मूत्र, फसलों के अवशेष, कुक्कुट से प्राप्त अवशेष आदि उपयोग में लाये जाते हैं। 

• हरी खाद्य जैसे ढेंचा, बरसीम, सनई, मूंग और सिस्बेनिया जैसी फसलों का उपयोग खाद के रूप में करने से भूमि उर्वरता बढ़ती है। 

• जिप्सम एवं चूने का उपयोग भूमि में क्षारीयता एवं अम्लीयता को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। 

• वानस्पतिक कीटनाशक का उपयोग रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर किया जाता है। 

जैविक खेती में बाधाएं

जैविक खाद का मूल्य रासायनिक उर्वरकों की तुलना में अधिक होने से छोटे एवं सीमान्त किसानों  के लिए इनका उपयोग करना कठिन होता है। 

जैविक खादों की सुलभता में कमी का होना भी एक कारण है। 

बाजार में उपलब्ध बीज का सामान्यतः उपचारित होने से, पूर्णतः जैविक खेती करना कठिन है। 

जैविक फसलों की परिपक्वता में समय लगने से इनसे प्राप्त उत्पादों की कीमत अधिक होती है, जिससे निम्न वर्ग तक इन उत्पादों का पहुंचना मुश्किल होता है। 

निष्कर्ष

कुछ दशकों पहले का भारतीय कृषि इतिहास जैविक खेती की आधारशिला पर ही आधारित था। बदलते समय, आवश्यकता एवं बढ़ती जनसंख्या पारम्परिक खेती में बदलाव की मुख्य वजह रही। जिनमें बहुत सारे रासायनिक उत्पादों एवं नई तकनीकों ने इन आवश्यकताओं को पूरा करने में अहम् योगदान दिया। यद्यपि इनके दूरगामी परिणाम, रसायनों के बढ़ते प्रदूषण, इनका स्वास्थ पर प्रभाव तथा भूमि उर्वरता में भारी कमी के रूप में प्रदर्शित होने लगे।

अतः जैविक खेती को इन समस्याओं के लिए बेहतर विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। भारत सरकार के द्वारा भी जैविक खेती को प्रोत्साहित करने हेतु बहुत सी योजनाएं बनाई जा रही हैं, जिनके सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में जैविक खेती का क्षेत्र एवं उत्पादन तेजी से बढ़ा है। आर्गेनिक फार्मिंग एक्शन प्रोग्राम 2017-2020 का उद्देश्य भी जैविक खेती को प्रोत्साहित एवं विकसित कर भारतीय कृषि को नए आयाम में ले जाना है। आज भारत में जैविक खेती में अपना योगदान देने के साथ ही यहाँ 8,35,000 पंजीकृत जैविक खेती के उत्पादक हो गए है।

जैविक खेती के उपयोग से किसान अथवा उत्पादक को दूरगामी लाभ प्राप्त होने के साथ साथ इसकी उत्पादन लगत भी 25-30 प्रतिशत तक कम हो जाती है. साथ ही यह भूमि की गुणवत्ता एवं उर्वरता बढ़ाकर, भूमि में कार्बन अवशेष की मात्रा को भी बढ़ाता है। इसके द्वारा फसल की उत्पादकता एवं उत्पादन बढ़ने के साथ ही स्वास्थ फसल प्राप्त होती है। अतः जैविक खेती कृषि सुधार के क्षेत्र में अपनी अहम भूमिका निभाने के साथ-साथ भारतीय कृषि पध्दति को भी सुधारने  का कार्य  कर रही है।  

– विकास पगारे, आसिया वाहिद, एवं शिलपा एस सेलवन

पीएचडी शोधार्थी, भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली