मैं खुद को सौभाग्यशाली समझता हूं कि मेरे नाम में ही गाय है। मैं किसान के घर में पैदा हुआ हूं, मेरे पिताजी किसान थे। गाय के साथ मेरा नाता मां के रूप में है।
बचपन में जब भी समय मिलता था मैं गाय चराने जाया करता था। तब पता चला कि गाय का मां से भी ऊंचा स्थान है।
धीरे-धीरे मैं ‘स्वयं सेवक संघ’ के कार्य में जुटा। उसकी जिम्मेदारी निभाते-निभाते ‘विश्व हिंदू परिषद’ का दायित्व मेरे पास आया, तभी से मैंने गौरक्षा प्रारंभ की। जब मुझे पता चला कि कसाई बड़ी संख्या में गौवंश लेकर जाते हैं। उबलते पानी को उसके शरीर पर डाला जाता है और गौ माता तड़प – तड़प कर अपनी जान दे देती है। देवनार कत्लखाना में यह सब मैंने प्रत्यक्ष देखा है।
तब मुझे पता चला कि आज गौमाता बड़े पैमाने पर यातना सह रही है और जिस प्रकार से उसकी कटाई हो रही है उसको रोकना जरूरी है। एक तो यह विषय और दूसरा जिस धर्म में मैं जीता हूं, मेरे धर्म का प्रथम कर्तव्य है गौ मां की सुरक्षा। गौ मां हमारा मानबिदुं है, हिंदू समाज का मानबिंदू है। हिंदू समाज में जितने भी कार्य होते हैं गृह प्रवेश हो, शादी हो उसमें गौ माता की जरूरत पड़ती ही पड़ती है।
आपको बताना चाहूंगा कि जब मेरी मां की सात साल की उम्र में शादी हुई थी, तब उनके साथ में एक गाय को भेजा गया था। उस समय दुल्हन के साथ गौदान करने की परंपरा थी । यह प्रथा आज भी कई जगह है, लेकिन बड़े पैमाने पर यह परंपराअब लुप्त हो गई है।
गौरक्षा आंदोलन प्रारंभ करते हुए ‘विश्व हिंदू परिषद’ और ‘बजरंग दल’ के द्वारा हमने हूंकार भरी कि “गाय नहीं कटने देंगे, देश नहीं बंटने देंगे।“
इसी आधार पर मुंबई में हमने बड़े पैमाने पर काम शुरू किया। देवनार के कत्लखाने में गाय काटे जाने को लेकर संघर्ष किया। कत्लखाने ले जाई जा रही गौ माता के हमने रोका और भिवंडी के गौशाला में भेज दिया।
उस समय महाराष्ट्र में इस सम्बन्ध में कानून भी नहीं था और जो कानून था भी, वह आधा-अधूरा था। कई बार पुलिस से हमको झगड़ा करना पड़ा। जेल जाना पड़ा। इसके साथ-साथ कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर समाज में गौ माता को लेकर श्रद्धा जगाने का भी काम किया। आखिरकार महाराष्ट्र में सरकार को कानून पास करना पड़ा। फिर वही कानून 2015 में संसद में पास होकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद महाराष्ट्र में लागू हुआ है।
ये खुशी की बात है, लेकिन इतनी सी खुशी पर्याप्त नहीं है। आज भी हजारो-लाखों की संख्या में गौमाता का कत्ल किया जा रहा है।
आज लोगों के मन में गौमाता को लेकर उसके प्रति भाव और श्रद्धा कम होती जा रही है। उसका कारण है कि आज किसानों को जीने के लिए हर दिन जो अर्थ की व्यवस्था होनी चाहिये वह प्राप्त नहीं हो रही है।
विश्व हिंदू परिषद के माध्यम से पूरे देश भर में हजार से ऊपर गौशालाएं हैं, लेकिन वह प्रर्याप्त नहीं है। आज भी गौमाता चित्कार रही है। देश में जब तक गौमाता की खून गिरता रहेगा, तब तक इस देश में ‘स्वराज’ की बात करना व्यर्थ है। स्वराज तब आयेगा जब गौमाता का कत्ल रुकेगा।
गौमाता का क़त्ल रोकने के लिए घर-घर जाकर ‘विश्व हिंदू परिषद’ और ‘बजरंग दल’ के माध्यम से गांव-गांव में चौकियां लगायी गई हैं। हमने एक नारा दिया है कि ‘हर गांव में एक गौपाल।‘ इस प्रकार की एक सुरक्षा व्यवस्था खड़ी करने में हम लगे हुए हैं।
अगर गौ माता को बचाना है तो किसानों को समृद्ध करना पड़ेगा। किसानों को शक्तिशाली करना पड़ेगा। इसके साथ-साथ गौमूत्र और गोबर के उत्पादन, पंचगव्य के उत्पादन, गोबर की लकड़ी बनाकर उसके द्वारा शवदहन इत्यादि करने से गौमाता समृद्ध होगी, किसान समृद्ध होगा। गौ उत्पाद हमें घर-घर, गांव-नगर में फैलाने पड़ेंगे, तब जाकर गौमाता की हत्या बंद होगी और गौमाता का उत्थान हो पायेगा।
अपने राज्यों में जो भी देसी नस्ल की गाय है, वहां उसी नस्ल को सम्मानपूर्वक रखा जाना चाहिए।
अधिकतर लोगों का मानना है कि गीर गाय पालनी चाहिए, क्योंकि वो अधिक दूध देती है, लेकिन मेरा मानना है कि गाय की सेवा और उसकी देखरेख अच्छी होगी तो किसी भी नस्ल की देसी गाय हो, गीर से अधिक दूध दे सकती है।
एक गोपालक के पास देसी नस्ल की छोटी गाय थी। उन्होंने हमसे कहा हमें गीर गाय रखनी है, क्योंकि हमारी गाय छोटी है और डेढ़ लीटर दिन का दूध देती है। तब हमने कहा कि हमारे सिस्टम से गाय को खाना देकर देखो। उन्होंने ऐसा ही किया, तब एक ही साल में वही डेढ़ लीटर वाली दस डांगी गायों का दूध चार लीटर हो गया। खाना खाया गीर के सामने सिर्फ तीस टका।
पूरे गुजरात में गीर गाय के दूध का एवरेज आठ से दस लीटर है। वो डांगी गाय उससे भी आगे चली गईं।
हम किसी भी गौमाता को बांधते नहीं हैं। सभी गायों का अपनी मर्जी से खाना होता है। कब खाना है और कितना खाना है यह गौ माता ही तय करेगी। देसी गाय कभी भी ज्यादा नहीं खाती है। हर एक वाड़े में पानी पीने की व्यवस्था है। वो अपनी मर्जी से पानी पीती हैं, चारा खाती हैं।
हर मौसम में गौ माता के पानी पीने का समय अलग अलग होता है तो हम कैसे तय करेंगे कि किस समय उनको प्यास लगी है। ठंड में उनको अलग क्वांटीटी चाहिये, अलग समय पर पानी चाहिये, गर्मी में अलग चाहिये। इसीलिये उनके सामने चारा और पानी खुला रखा है। ये गौ माता को तय करना है कि कब खाना है और कब पीना है।
उसको चारा के साथ दाना कैसे लगेगा, अगर जिसका दूध बहुत अच्छा है उसके कैसे दाना देना पडेगा, उसके पाचन सिस्टम होता है, बैलेंस फूडस कैसे बनाना है, इन सभी विषयों पर सूक्ष्म अभ्यास करना चाहिये।
उसके पाचन प्रक्रिया को समझना है। गोबर देखकर किसान को पता चल जाना चाहिये कि उसका स्वास्थ कैसा है, उसका पाचन तंत्र कैसा चल रहा है।
हमारी बंसी गौशाला में हर गौमाता को उसके नाम से पुकारते हैं। दूध देने के लिए जिस गौमाता को बुलाते हैं वही गौ माता बाहर आती है। दस दिन का बच्चा भी दूध पीने के लिए मां का नाम सुनकर बाहर आता है।
मैं सभी से यह कहना चाहता हूं कि आप अपनी माता को सम्मान पूर्वक रखना सीखें। और गाय, कृषि तथा गौ आधारित भारत का पुनःनिर्माण करें।
देसी गाय का इलाज़ अपने घर में ही सस्ते में कैसे कर सकते हैं यह मैं आपको बताने जा रहा हूं।
गाय जब सींग से मारती हो
जो गाय सींग से मारती है, उसका एलोपैथी में कोई इलाज़ नहीं है, लेकिन होम्योपैथी में उसके लिए एक दवा है ‘नक्स वोमिका’। इसकी दौ सौ पोटेंसियल की दवा लेकर उसकी दस बूंद रोज़ सुबह-शाम गाय को देंगे तो उसकी मारने की आदत छूट जाएगी और उसका स्वभाव बदल जाएगा।
गाय जब लात से मारती हो
जो गाय दूध निकालते समय लात से मारती है, उसके लिये होम्योपैथी की दवाई है ‘लेकेसिस’। इसकी 1000 पावर की 10 बूंद 15 दिन में एक बार देंगे, तो दो महीने में वह लात मारने की आदत भूल जायेगी।
गाय का बछड़ा -बछड़ी मर गया हो
जिस गाय का बछड़ा-बछड़ी मर गया हो, वो मां है उसको पीड़ा होती है, तो वह दूध देना बंद कर देती है। उसके लिए होम्योपैथी में दवाई है इगनेसिया 200 पावर। इसकी 10-10 बूंद 10 दिन तक देंगे तो वह गाय वापस अपने दूध पर आ जाएगी, दुःख भूल जाएगी । अगर किसी व्यक्ति के साथ ऐसी घटना हुई है, किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु हो गई या व्यापार में बड़ा घाटा हो गया, आदमी एकदम डिप्रेशन में चला गया, उसको भी अगर इगनेसिया 200 की 2-2 बूंद देंगे तो वह 10 दिन में सामान्य हो जाएगा।
कील या कांटा गड़ गया हो
जिस गाय को कोई कील गड़ गई, कोई कांच गड़ गया, कोई कांटा चुभ गया हो अथवा किसी मधुमक्खी, ततैया या किसी जीव ने डंक मार दिया हो, उसके लिए दवाई है ‘लेडम पाल 30 पावर’। उसकी 10-10 बूंद आधे-आधे घंटे से 4 बार देनी है। तीन घंटे में गाय एकदम नार्मल हो जाएगी। सारी सूजन उतर जाएगी। बाद में वो कील-कांटा अपने आप निकल जाएगा और वह ठीक हो जाएगा। टिटनेस का इंजेक्शन भी नहीं लगाना पड़ेगा।
थन से खून आना
जिस गाय के थन से खून आ रहा है, ब्लाडिंग हो रही है तो वह दूध बिल्कुल काम नहीं आता। उसके लिए दवाई है ‘इप्पीकाक 200’ पावर। इसकी10-10 बूंद पांच-सात दिन देंगे तो उसका खून आना बंद हो जायेगा और शुद्ध दूध आना शुरू हो जायेगा।
थन सूज जाना
जिस गाय का थन सूज गया है दूध नहीं निकालने देती, हाथ नहीं लगाने देती, उसके लिए दवाई है ‘बेलाडोना’ 200 पावर। ये दवा लगातार 8-10 दिन देने से उसके थन की सूजन उतर जाएगी।
बच्चादानी बाहर आने पर
जिस गाय की बच्चादानी बाहर आती है। उसके लिए दवाई है ‘सीपिया 200’। इसकी 10-15 दिन 10-10 बूंद रोज़ देंने से वह ठीक हो जाएगी। जब बच्चादानी बाहर है, उस समय नीम के पत्ते उबालकर ठंडा करके उससे उसे धो दीजिए ताकि इंफ्क्शन समाप्त हो जाए। इसके बाद फिटकरी पीसकर उसमें पानी मिला लें और फिर कपड़ा भिगोकर पानी उस पर चिपोड़ दीजिए, तो उससे वह अंदर चला जाएगा, फिटकरी का काम है सिकोड़ना और ‘सीपिया’ उसको स्थायी रूप से ठीक कर देगा।
आफ़रा होने पर
जिस गाय का पेट फूल गया, फूड्स प्वायजनिंग हो गया हो, उसके लिए तीन चार दवा हैं। एक है अमृतधारा। अमृतधारा की 10-10 बूंदे हर आधा घंटे में दिन में 2-3 बार देंगे तो उसका आफ़रा ठीक हो जायेगा। दूसरा, 10-15 ग्राम हींग घोलकर आधा लीटर पानी में मिलकर पीला दीजिये उससे भी उसका आफ़रा ठीक हो जाएगा। इसके अलावा तीसरा इलाज़ है ईनो। ईनो पिला दीजिए उससे भी उसका आफरा ठीक हो जाएगा। इसके लिए होम्योपैथी में दवाई है ‘कार्बो वेज’ 30 पावर। इसे आधा-आधा घंटे से 2-3 बार देने से ठीक हो जाता है। अगर इन सब में से कुछ भी नहीं है तो गाय के बायें ओर का जो पेट है उसका नर्म स्थान देखकर मोटी सुई उसके पेट में खोप दीजिए और बाद में ऊपर से खोल दीजिये तो गैस निकल जाएगी, गाय बच जाएगी, नहीं तो दम घुटने से वह मर भी सकती है।
थनेला होने पर
ऐसे ही जिस गाय को ‘थनेला’ हो गया, थनेला मतलब जिसका थन खराब हो जाता है ऊपर दूध जम जाता है दूध आना बंद हो जाता है कभी एक थन, कभी दो, कभी तीन तो कभी चारो थन। उसके लिए इलाज है देसी चने। 200 ग्राम चने सुबह भिगो दें। शाम को उसे कपड़े में बांध दें। वह चना अंकुरित हो जायेगे। उस चने को 15 से 20 दिन खिलाने से वह थन वापस चालू हो जायेगा। दूसरा इलाज है शीशम के पत्ते। शीशम के पत्ते की चटनी बनाकर जहां दूध जम गया है वहां दिन में दो बार लेप करें। अगर दूध के जमने के कारण गादी पत्थर हो गई है, तो भी 6-7 दिन में वह गादी बिल्कुल नरम हो जाएगी। इसके बाद नीम के पत्ते उबालना या लाल दवा को मोटी सुई से 100 ग्राम पानी चढ़ाना, बाद में उसमें उसको निचोड़ देना। इससे दूध निकल जाएगा। दो – तीन बार ऐसा करने से उसका थन चालू हो जाएगा।
अब थन खराब क्यों होता है। दूध निकालने के बाद या बछड़े को पिलाने के बाद अगर हमने थन नहीं धोया या गाय बैठ गई और थन खुला है तो जीव घुस जाते हैं, उससे वह थन खराब हो जाता है। इसलिये सावधानी रखनी होती है कि थन खराब न हो।
गाय गर्भवती है कैसे जानें
गाय गर्भवती है कि नहीं इसकी पहचान करनी है तो उसी गाय के गौमूत्र में 100 ग्राम मूंग के दाने ग्लास में भिगो दें। शाम को कपड़े में बांध दें। दूसरे दिन खोलकर देखेंगे तो गौमूत्र में भीगे मूंग अगर 10-12 से ज्यादा अंकुरित हैं तो गाय गर्भवती नहीं है। अगर 10-12 से कम अंकुरित है तो गाय गर्भवती है। दूसरा उपाय है कि गाय के गोमूत्र में 4-5 बूंद नीबू डालकर देखें। अगर उसका रंग बदलता है तो गाय गर्भ से है। नहीं तो गाय गर्भवती नहीं है।
‘हीट’ में न आने पर
कई बार दो-दो, चार-चार साल हो जाते हैं गाय हीट में नहीं आती तो वह गर्भधारण नही कर पाती। उसके लिए एक छोटा सा इलाज़ है जायफल। उसका ऊपर का छिलका उतारकर, उसको फोड़कर, गुड़ में लपेटकर एक जायफल गाय को खिला देना। वह इतना गरम होता है कि उससे अपनी गाय हीट में आ जायेगी। अगर जायफल किसी कारण से नहीं मिले तो चार छोआरे लेकर उसकी गुठली निकालकर उसके टुकड़े करके गुड़ में लपेटकर उसको आठ दिन गाय को खिलायें, उससे भी गाय हीट में आ जाती है। अब अगर गाय हीट में आती है पर ठहरती नहीं है बार-बार रिपीट होती है तो उसके लिये हीट में आने के बाद गाय को एलोविरा का एक कप रस सोमवार, बुधवार, शुक्रवार, रविवार, मंगलवार एक दिन छोड़कर एक दिन ऐसे पांच बार उसको पिला दीजिये। जब हीट में आये क्रास करवाइये, गर्भ ठहर जाएगा।
जेर न डालने पर
गाय बच्चे को जन्म देने के बाद कभी-कभी जेर नही डालती। उसका कारण है कि गाय को भय लगता है कि कुत्ता या कोई जानवर आकर उनके बछड़े-बछड़ी को नुकसान न पहुंचाए, इसलिए वो जेर नहीं डालती। क्योंकि जेर की गंध से कुत्ता आता है। इसलिए गोपालक को जब तक जेर नहीं पड़ जाये वहां रहना चाहिये। उसके बाद भी अगर देर हो रही हो तो उसके लिये छोआरे की आधी गुठली को फोड़कर गुड़ में लपेटकर खिला दें, थोड़ी में वह बाहर आ जायेगी।
सहज प्रसव के लिए
गाय का सहज प्रसव हो, कष्ट न हो उसके लिए आधा किलो गोबर, एक लीटर पानी में घोलकर छानकर गाय को पिला दीजिये, घंटे भर में आराम से प्रसव हो जाएगा। यह बच्चा दानी का मुंह खोल देता है। इसके लिए होम्योपैथी में दवाई है ‘कोलोफाइलम’ 200 पावर। उसकी 10 बूंदे आधे-आधे घंटे से दो बार देने से आराम से प्रसव हो जाएगा।
जिस गाय की कुली उतर गयी हो, तो उसके लिये छहः चीजे रखनी है। पान का गीला चूना, दूसरा हल्दी, तीसरा शहद, चौथा गुड़, पांचवा बैंड्रज पट्टी, छठा रुई। इसके बाद थोड़ा गीला चूना, उतनी ही हल्दी और शहद मिलकर किसी कटोरी में पेस्ट बना लें । बाद में थोड़ा गुड़ लेकर थोड़ा पानी मिलाकर उसका लेप लगा देना। देरी करेंगे तो वह जम जाएगा। बाद में बैंड्रेज के चार फोल्ड करके पहले पट्टी चिपकाना, बाद में रुई चिपकाना नहीं तो बाल उखाड़ेगी। उसे छह-सात दिन चिपका रहने दें। वह ठीक हो जाएगी।
तो ऐसे छोटे-छोटे उपाय से हम अपने गाय को अपने घर में ठीक कर सकते हैं।
दवा कैसे दें
गाय को दवा देने के लिए रोटी की पपड़ी उतारकर कर उसमें दवा की दस बूंदे डालें और वह रोटी गाय को खिला देनी है। या फिर आधा लीटर पानी में 10 बूंद डालकर नाल के द्वारा या बॉटल में भरकर उसको पिला देना तो उससे वह दवा उसके अंदर चली जाएगी।
तो ऐसे बहुत छोटी-छोटी चीजों के द्वारा हम अपनी गायों को घर में ही ठीक कर सकते हैं।
(श्री शंकर लाल वर्ष 1960 से अखिल भारतीय गौ सेवा गतिविधि के पालक और संघ के प्रचारक हैं।)
विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्गत अनगांव, भिवंडी, महाराष्ट्र में ‘श्री भारतीय गोवंश संरक्षण संवर्धन परिषद’ द्वारा ‘गोपाल गौशाला’ का संचालन किया जा रहा है. मैं त्रिलोकचंद गनेशमुख जैन सचिव के नाते से यहाँ पर काम देख रहा हूँ. श्री अशोक सिंघल की प्रेरणा से वर्ष 2000 में इस गौशाला की शुरुआत हुई. गौशाला का मुख्य उद्देश्य है, कसाइयों द्वारा अवैध क़त्लखानों में काटे जाने वाले गोवंश को बचाना.
गौशाला की शुरुआत में अवैध क़त्लखानों से गोवंश को बचाने का काम एडवोकेट ललित जैन देखते थे, लेकिन वर्ष 2002 में कसाइयों ने ललित जैन की कोर्ट के बाहर हत्या कर दी. इसके बाद गौशाला के काम में काफ़ी उतार-चढ़ाव शुरू हो गया. तब मनोज भाई राईचा ने इस संघर्षपूर्ण काम को सँभालने की ज़िम्मेदारी ली.
गौशाला की शुरुआत 200 गोवंश से हुई थी. अब तक 25 हज़ार से ज़्यादा गोवंश कसाइयों से पकड़कर हमारे पास आये हैं. उनके केस कोर्ट में चल रहे हैं. जो केस किलियर हो गए हैं, उन गोवंशों को हमने महाराष्ट्र की गौशालाओं में पालने के लिए भेजा हुआ है.
वर्तमान में श्री गोपाल गोशाला में 2 हज़ार 21 सौ गोवंश रखने की व्यवस्था है. ये गौशाला 21 एकड़ ज़मीन पर है. गायों को रखने के लिए डेढ़ लाख स्क्वायर फिट के शेड हैं. 50-60 हज़ार फिट के गोडाउन हैं. 70 कर्मचारी यहाँ काम करते हैं. उनके रहने के लिए खोली की व्यवस्था है. एक बायोगैस का प्रोजेक्ट है, 4-5 बोरवेल हैं, एक बावड़ी है.
गौशाला का मासिक ख़र्च 30 से 40 लाख रुपए है. गौशाला के माध्यम से 10 से 12 लाख की आय हो जाती है. बाकी का ख़र्च डोनेशन के माध्यम से चलता है.
गौशाला को आत्मनिर्भर बनाने का हमारा प्रयत्न चल रहा है. इसके लिए ‘काऊ टूरिज्म’ की योजना पर विचार किया जा रहा है. देसी खाद तैयार करने का प्रोजेक्ट लगाया हुआ है. पहले हम गोबर की बिक्री करते थे, लेकिन अभी यहाँ पर पीताम्बरी और अन्य विविध व्यासपीठ वालों के सहयोग से यहाँ पर देसी खाद का प्रोजेक्ट लगाया हुआ है और महीने में दो – ढाई लाख की इनकम हो जाती है.
इस तरह साल में 30 लाख रूपये गोबर के माध्यम से मिलता है, 7 – 8 लाख रुपये देसी गोमूत्र के माध्यम से मिलता है. करीब 100 गाय दूध देने वाली हैं. 8 – 9 लाख रुपये दूध के माध्यम से मिल जाता है. इस तरह साल में तीन – साढ़े तीन करोड़ के ख़र्च के अन्दर से सवा से डेढ़ करोड़ की इनकम गौशाला की चल रही है.
विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल के माध्यम से आस पास के किसानों के संपर्क में रहते हैं और उन्हें गोकृपा अमृत का प्रशिक्षण देते हैं. मेडिकल सुपरवीजन के बाद डॉक्टर के कहने पर किसान को बैल की जोड़ी फ्री में देते हैं.
लोगों को जोड़ने के लिए ‘एक गाय गोद लो’ योजना पर भी काम चल रहा है. इस योजना में युवाओं का काफ़ी सहयोग मिल रहा है.
युवाओं को गौशाला से जोड़ने के लिए पिछले चार साल से ‘गौशाला प्रीमियम लीग क्रिकेट’ का आयोजन हमारे युवा करते हैं. एक दिन के आयोजन में 50-60 टीमें आती हैं.
युवाओं ने भिवंडी और भिवंडी से बाहर की टीमों से संपर्क करके हर साल 2-3 सौ गाय गोद लेने का काम कर रहे हैं. इस तरह हर साल 30 से 40 लाख रुपये एकत्र हो जाते हैं. गोद लेने वाला व्यक्ति महीने दो महीने में गौशाला आकर अपनी गाय देखकर जाता है और गौशाला के लिए कुछ न कुछ सहयोग भी देता है.
एक गाय का प्रतिदिन का सिर्फ़ चारे का ख़र्च 40 से 50 रुपये है. पचास से एक करोड़ का चारा हम गोडाउन में रखते हैं.
सुबह सात बजे चुन्नी की व्यवस्था रहती है. जो नाश्ते के रूप में गायों को मिलती है. दोपहर के समय हरे घास की व्यवस्था, और शाम को सूखे घास की व्यवस्था रहती है.
जिन किसानों के पास ज़मीन रहती है – घास रहती है, तो उसको 50 रुपये का भी ख़र्च नहीं आता है. उस पर भी वो चाहे तो गोबर से भी बहुत सारे डेवलेपमेंट कर सकता है. गोबर गैस का प्लांट लगा सकते हैं, गोबर की खाद बना सकते हैं. गोमूत्र का खेती को उपजाऊ बनाने के लिये उपयोग कर सकते हैं.किसान को इंडिपेंडेंट होने के लिए गाय से अच्छा माध्यम कोई नहीं है.
हमारे गुरु जी कहते हैं कि गौ माता और किसान अगर दुखी रहेंगे तो देश कभी खुश नहीं रहेगा। इसी बात का अनुसरण करते हुए लगभग 15 साल पहले हम मुंबई छोड़कर यहां अहमदाबाद आ गए। यहां आकर हमने ‘बंसी गीर गौशाला’ की स्थापना की। हमारे पूर्वज गीर गौ माता रखते थे, इसीलिए हम लोगों ने भी गीर गौमाता रखने का फैसला किया और गीर गोवंश की शुद्धता के लिए कुछ प्रयोग शुरु किये।
‘बंसी गीर गौशाला’ में अभी तकरीबन 600 गौवंश हैं. 150 दूध देने वाली गौ माता हैं और उतने ही बच्चे हैं। 100 के करीब बछड़े है, जिन्हें हम लोग उसको नंदी ग्राम के लिए तैयार कर रहे हैं। हम गोवंश की अच्छी नस्ल का ध्यान रखते हैं, इसीलिए हमारे नंदी की बुकिंग एडवांस में होती है। गौशाला में गीर गोवंश के 18 गोत्र की गाय है। उसके बछड़े तैयार करके हम लोग गांव वालों को देते हैं।
‘बंसी गीर गौशाला’ में हम लोग गौ आधारित कृषि को भी बढ़ावा दे रहे हैं. इसके लिए ज़रूरी है गाय को रखना।
शुरुआत में हमें अच्छी गाय कम मिली थीं। अधिकतर ऐसी गायें थीं, जिसका पांच या सात ब्यात हो चुका था अथवा एक या दो आंचल खराब हो चुका था, या फिर नॉन – फ़र्टाइल होती थीं। ज़्यादा पैसे चुकाकर हम वैसी गाय लेकर आये और उसकी अच्छी परवरिश की। उसको ऑर्गेनिक फूड दिया, आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट दिया, जिससे वो फिर से अच्छा परफॉम करने लगीं। और, जैसा हमने सोचा था हक़ीक़त में अपनी आँखों से देखा। आज हमें इसका परिणाम मिल रहा है। 15 ब्यात के बाद भी गौ माता परफॉम करती है। तो ऐसे ही गौमाताओं को और उनके वंश को कैसे बढ़ाया जाये, इसके लिए हम नए-नए प्रयोग करते हुए कार्य कर रहे हैं।
कुछ समय पहले तक गाँव के युवा खेती से मुंह मोड़कर रोजगार की तलाश में शहरों का रुख कर रहे थे, लेकिन अब परिस्थितियों में बदलाव देखने को मिल रहा है। परंपरागत कृषि विकास के क्षेत्र में रूचि लेते हुए अब गाँव के युवा किसान आजीविका के लिए शहरों का मोह त्यागकर अब गाँव में ही जैविक खेती कर दोहरा लाभ ले रहे हैं।
महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के दर्जनों गांवों के किसान गौ आधारित जैविक खेती कर कर रहे हैं। गौ आधारित जैविक खेती के लिए आवश्यक उर्वरक और अन्य कीटनाशक गोबर और गोमूत्र से घर पर ही निर्मित कर लेते हैं। अतः खेती में इनकी लागत लगभग शून्य हो जाती है और अंतराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद अधिक खरे उतरते हैं। जिसके फलस्वरूप सामान्य उत्पादन की अपेक्षा में कृषक भाई अधिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं। साथ ही देसी गायों से मिलने वाले गोबर और गोमूत्र से जैविक उत्पाद बनाकर अन्य किसानों को उचित मूल्य पर बेचते हैं इससे इन्हें दोहरा लाभ प्राप्त होता है।
महाराष्ट्र के गोंदिया जिला के तिरोड़ा स्थित अडानी फाउंडेशन के सहयोग से देवलापार अनुसन्धान केंद्र में गौ आधारित जैविक कृषि का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके इन किसानों में से एक हीरानंद पटले ने हमें बताया कि उन्होंने आज से चार पांच वर्ष पहले ही जैविक खाद बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। साथ ही उन्होंने गौमूत्र से अन्य औषधीय उत्पाद जैसे कि जीवामृत,अमृतपानी आदि बनाने का प्रशिक्षण लिया था। जैविक खाद स्वयं बनाते हैं जिसका उपयोग हमारे खेतों में होता है। इससे अच्छी उपज के साथ गुणवत्तापूर्ण अनाज और सब्जियाँ प्राप्त होती हैं।
इससे पूर्व एक और किसान मधुकर हजारे ने अपने लहलहाते धान के खेत को दिखाते हुए बताया कि उन्होंने अपने खेत में जैविक खाद और पञ्चगव्य आधारित उर्वरक का उपयोग कर धान की रोपाई की है।
जिले के सुकड़ी तालुका के बालापुर नामक गाँव के एक अन्य किसान दंपत्ति श्रीमती स्वाति संजय बिसेन जैविक खेती के साथ साथ गौपालन भी कर रहे हैं। श्रीमती स्वाति बिसेन अपने पति संजय बिसेन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर गौ पालन के साथ-साथ पंचगव्य आधारित जैविक खेती कर रही हैं। संजय बिसेन ने बताया कि वे कीटों से फसल की सुरक्षा के लिए गौमूत्र और अन्य जड़ी के साथ मिलाकर घर पर ही बनाये गए आग्नेयास्त्र नामक कीटनाशक का प्रयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि धान की अच्छी पैदावार के लिए खेतों में जीवामृत का छिड़काव करते हैं। संजय ने बताया कि उन्होंने गाँव के अन्य किसानों को भी प्रोत्साहित किया है और वे उनकी खेती देखकर पञ्चगव्य आधारित जैविक खेती की ओर उन्मुख भी हो रहे हैं। वहीं श्रीमती स्वाति संजय बिसेन ने हमें बताया कि खेती के लिए आवश्यक गौवंश देवलापार से नि:शुल्क प्राप्त हुए हैं जिनसे हमें दूध के साथ-साथ गोबर भी उपयुक्त मात्रा में प्राप्त होता है। गोबर से घर पर केचुआ खाद का निर्माण करते हैं, जिसका उपयोग हम अपने खेतों में करते हैं। श्रीमती बिसेन ने बताया कि पंचगव्य आधारित जैविक खेती से हमें प्रति एकड़ 20 कुंतल तक धान की उपज प्राप्त हो जाती है।
बता दें कि अडानी फॉउंडेशन के सहयोग से प्रशिक्षण प्राप्त कर जैविक खेती करने वाले सभी किसानों को गायें और गौवत्स निःशुल्क प्रदान किये जाते हैं।
फ़्रांस के मशहूर चित्रकार बर्नार्ड पिकार्ट ने भारत में गौमूत्र चिकित्सा को दर्शाता एक चित्र बनाया था जिसमें बीमार एवं मरणासन्न व्यक्ति को गाय की पीठ पर औंधे मुँह इस प्रकार लिटाया गया था कि गाय का मूत्र सीधे रोगी के मुख में प्रवेश कर सके। 18वीं शताब्दी के शुरू के वर्षों में बनाया गया यह चित्र भारत में गौ मूत्र के महत्त्व को दर्शाता है।
गौमूत्र पंचगव्यों में से एक है। वर्तमान में गौमूत्र को गाय के मुख्य उपादान घी और दूध के पश्चात सर्वाधिक लाभकारी होने का दावा किया जा रहा है। कहीं-कहीं तो गौमूत्र को घी और दूध से भी अधिक महत्त्व दिया जा रहा है। हालाँकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञानियों का मानना है कि ये दावे अस्पष्ट, अतिरंजित और अप्रामाण्य हैं, फिर भी उन्हें यह तो स्वीकार करना ही होगा कि हजारों वर्ष पूर्व लिखित आयुर्वेद में गौमूत्र को अमृत समान कहा गया है। इसीलिए आज के समय में गौमूत्र को जैविक औषधीय विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
गोमूत्र पर शोध करने वालों की मानें तो गौमूत्र में कुछ आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों को मिलाकर बनायी गयी दवा से कैंसर जैसे शत-प्रतिशत जानलेवा बीमारी को ठीक किया जा सकता है। उत्तराखंड के पवलगढ़ स्थित गौमूत्र क्रांति अभियान के संचालक और वैद्य प्रदीप भंडारी ने ब्लड कैंसर से पीड़ित कई मरीजों को गौमूत्र चिकित्सा से ठीक करने का दावा किया है। इनमे से कई मरीजों ने तो अपनी बीमारी के ठीक होने का वीडियो भी जारी किया है, जिसमें वे अपनी बीमारी के गौमूत्र से इलाज के पश्चात पूरी तरह ठीक होने का दावा करते नजर आ रहे हैं।
इसी प्रकार महाराष्ट्र के भंडारा जनपद स्थित एक फार्मेसी कालेज के प्रोफेसर डॉ. संजय वाते ने गौमूत्र से प्रभावित होकर अभी हाल ही में गौमूत्र पर पीएचडी की है। डॉ. संजय वाते ने गौमूत्र की विशेषता का दावा यूँ ही नहीं किया। उनका कहना था कि वे स्वयं एक ऐसे जटिल त्वचा रोग से ग्रस्त थे जिसका उपचार एलोपैथी पद्धति से करने पर कुछ दिनों के लिए रोग की आक्रामकता में कुछ कमी तो आती थी लेकिन इलाज चलते रहने के बावजूद पुनः कुछ दिनों बाद रोग फिर तेजी से उभर आता था। कई वर्षों की असफल चिकित्सा के बाद वे नागपुर के देवलापार स्थित गौ-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र से गोमूत्र चिकित्सा शुरू की तो उसके आशातीत परिणाम देखकर वे गौमूत्र के चमत्कारिक प्रभाव से बहुत प्रभावित हुए तत्पश्चात उन्होंने कॉलेज के लेबोरेट्री में गौमूत्र पर गहन परीक्षण शुरू किया और फिर पीएचडी की डिग्री भी हासिल की। आज वे अपने रोग से पूरी तरह मुक्त होकर गौमूत्र चिकित्सा को बढ़ावा देने में देवलापार अनुसन्धान केंद्र का सहयोग कर रहे हैं।
गौमूत्र पर अनुसन्धान करने वालों का यह दावा है कि प्यूरीफाई गौमूत्र एक महौषधि है। इसके सेवन से त्वचा, हृदय, किडनी और पेट सम्बन्धी बिमारियों के साथ-साथ महिलाओं के रोग भी दूर हो जाते हैं। गौ-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र देवलापार ने गौमूत्र पर कई भारतीय, अमरीकी और चीनी पेटेंट भी हासिल किया है। हालाँकि कुछ वैज्ञानिक भले ही गौमूत्र की विशेषता को छद्म विज्ञान मानते हुए इसे भारतीय नवाचार की संज्ञा देते हैं फिर भी गौमूत्र से होने वाले प्रत्यक्ष लाभों को यूँ ही अनदेखा नहीं किया जा सकता। गौमूत्र पर अनुसन्धान करने वालों ने प्रयोगशालीय परीक्षणों से यह साबित होने का दावा किया है कि गौमूत्र एंटीबायोटिक्स, एंटीफंगल एजेंट और कैंसर विरोधी दवाओं को अत्यधिक प्रभावी बना देता है।
बहरहाल जो भी हो, गौमूत्र पर अभी और अधिक शोध की आवश्यकता है। भारत सरकार यदि इस दिशा में कोई ठोस कार्य-योजना तैयार करे अथवा बढ़ावा दे तो आनेवाले समय में चिकित्सा के क्षेत्र में गौमूत्र एक क्रांतिकारी औषधि साबित हो सकती है।
उत्तराखंड के पवलगढ़ स्थित गौमूत्र क्रांति संस्थान में गौमूत्र चिकित्सा से जानलेवा बीमारी कैंसर से पूरी तरह ठीक होकर लौटने पर गौमूत्र चिकित्सा से प्रभावित होकर जेजेटी यूनिवर्सिटी (राजस्थानी सेवा संघ) मुंबई और मरीज की परिजन राष्ट्रीय कवियित्री श्रीमती सुमिता केशवा द्वारा संस्थान के संचालक वैद्य प्रदीप भंडारी को प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया गया।
पवलगढ़: (उ.खं.) भारत में गौमूत्र चिकित्सा के क्षेत्र में वैद्य प्रदीप भंडारी ने कैंसर जैसे असाध्य और लाईलाज बिमारियों से ग्रस्त मरीजों के मन में उम्मीद की एक नयी किरण जगाई है। अभी हाल ही में मुंबई निवासी राष्ट्रीय कवियित्री श्रीमती सुमिता केशवा के एक परिजन जानलेवा कैंसर से पूरी तरह ठीक होकर लौटे हैं। गौमूत्र चिकित्सा के आश्चर्यजनक परिणाम देखकर और वैद्यजी के प्रशंसनीय तथा अद्भुत कार्यों से प्रभावित होकर कवियित्री श्रीमती सुमिता केशवा और जेजेटी यूनिवर्सिटी (राजस्थानी सेवा संघ) मुंबई ने वैद्यजी को प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित करते हुए उनका आभार जताया। वैद्य प्रदीप भंडारी ने गौमूत्र और अन्य आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के मिश्रण से लाईलाज बिमारियों से ग्रस्त कई मरीजों का सफल इलाज करने में सफलता प्राप्त की है।
आयुर्वेद में गौमूत्र को संजीवनी की संज्ञा दी गयी है। वैद्य प्रदीप भंडारी गौमूत्र पर लगभग पिछले 20 वर्षों से अपने शोध संस्थान ‘गौमूत्र क्रांति संस्थान’ में गहन शोध कर इसका सफल परिक्षण किया और आज कैंसर, हेपेटाइटिस, डायबिटीस, ब्लडप्रेशर, किडनी रोग जैसे तमाम असाध्य और शत-प्रतिशत जानलेवा बिमारियों का सफल इलाज कर रहे हैं। वैद्य प्रदीप भंडारी की गौमूत्र से कैंसर जैसे घातक बिमारियों से मरीज को ठीक कर देने की गूँज देश के महानगरों तक पहुँच चुकी है। कैंसर से ग्रसित प्रख्यात कवियित्री श्रीमती सुमिता केशवा के मुंबई निवासी एक परिजन ने चारों ओर से निराश होकर संस्थान में अपना इलाज कराना शुरू किया और कुछ ही दिनों में उनको लाभ होना शुरू हुआ और फिर अंततः पूरी तरह स्वस्थ होकर वे मुंबई वापस लौटे।
वैद्य प्रदीप भंडारी की चिकित्सा के क्षेत्र में इस अतुलनीय योगदान से प्रभावित होकर कवियित्री श्रीमती सुमिता केशवा पवलगढ़ जाकर वैद्यजी का सम्मान करते हुए उनका आभार भी जताया। इस अवसर पर उपस्थित काशीपुर की मेयर श्रीमती उषा चौधरी ने वैद्यजी के इन उपलब्धियों की भूरी-भूरी प्रशंसा की। इस मौके पर अनीता कम्बोज और अमिता कम्बोज भी मौजूद थीं।
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के दर्जनों गांवों के किसानों के लिए गाय से मिलने वाला घी-दूध नहीं बल्कि गोबर आमदनी का जरिया बन गया है। पारंपरिक रूप से खाद के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे गोबर से देवी-देवताओं की मूर्तियां, दीपक, राखी, गमले, सजावट के सामान, अगरबत्ती, धूपबत्ती, चूड़ियां और कंगन जैसे श्रृंगार प्रसाधन की सामग्री बनाकर लाखों रुपये कमा रहे हैं।
गोबर जैसे अपशिष्ट पदार्थ को अच्छी कमाई कजरिया बनाया जा सकता है, इसे छिंदवाड़ा जिले के सौंसर में मोहगाव स्थित स्वानंद गोविज्ञान अनुसन्धान केंद्र के संचालक डॉ. जितेंद्र भकने ने साबित कर दिखाया है। एक मुलाकात में डॉ. जितेंद्र ने बताया कि उनके यहाँ देसी गाय के गोबर और गौमूत्र से बने उत्पादों की मांग विदेशों तक से आ रही है। स्वानंद गोविज्ञान अनुसन्धान केंद्र में आसपास के किसान भी गोमय से उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त करने आते हैं। डॉ. जितेंद्र बताते हैं कि अबतक 10 हजार के आसपास किसानों ने उनके यहाँ से प्रशिक्षण लिया है। गोबर से बनाये जानेवाले रोजमर्रा के सामानों जैसे धूपबत्ती, मच्छरमार अगरबत्ती, हवन सामग्री, के अलावा गमले, देवी-देवताओं की मूर्तियां, राखी, सजावट के सामान, चूड़ियां, कंगन, झुमके आदि श्रृंगार प्रसाधन के सामान सहित शुभ-लाभ, स्वास्तिक की आज बाजार में बहुत मांग है। त्योहारों के समय प्रशिक्षित किसानों के यहाँ से गोबर के उत्पाद मंगाकर डॉ. जितेंद्र बड़े शहरों में भेजते हैं। इस प्रकार किसानों की भी अतिरिक्त आय हो जाती है। स्वानंद गोविज्ञान केंद्र में बनाये जाने वाले सामानों के सांचे (मोल्ड) के डिजाइन भी डॉ. जितेंद्र अपनी देखरेख स्वयं बनवाते हैं और इच्छुक किसानों को बहुत कम मूल्य पर उपलब्ध करवाते हैं।
डॉ. जितेंद्र भकने लाखों के पैकेज वाली अपनी नौकरी छोड़कर 2013 में जब 24 गायों से गौशाला शुरू की तो लोग उनका उपहास उड़ाने से नहीं चूकते थे। आज जो लोग उनका उपहास उड़ाते थे वही उनकी नक़ल कर गोबर और गौमूत्र से दवाइयां और अन्य सामान बनाकर लाखों कमा रहे हैं। शुरुआत में डिजाइनदार कंडे से अपना व्यवसाय शुरू करनेवाले डॉ. जितेंद्र आज लाखों रुपये महीने कमा रहे हैं और युवाओं के रोलमॉडल बने हुए हैं।
भारतीय नस्ल की देसी गायों और गौवंश को बचाने और गौशालाओं के स्वावलम्बी बनने के उपायों पर बोलते हुए सुनील मानसिंगका ने कहा कि गौशाला में होने वाले प्रतिदिन के खर्च से अधिक उसमे पलने वाली गायें या गौवंश दूध, गोबर और गोमूत्र के रूप में वापस कर देती हैं। आवश्यकता है इनके वाणिज्यिक उपयोग की। नागपुर के देवलापार स्थित गो-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र के समन्वयक सुनील मानसिंगका केंद्र में आये पत्रकारों के सवाल का जवाब देते हुए बोल रहे थे।
देवलापार अनुसन्धान केंद्र में आये पत्रकारों से बातचीत करते हुए मानसिंगका ने भारतीय पशुधन, जैविक कृषि और गौ आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर तथ्यात्मक विचार रखे। कृषि के क्षेत्र में भूमि सुधार सहित जैविक खेती अपनाने से लेकर अदुग्धा गाय या गोवत्स से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधरने तक की बात कही। सुनील मानसिंगका ने एक ओर जहां क़त्ल के लिए ले जाई जा रही गायों को बचने के प्रयास में आने वाली कठिनाइयों के बारे में खुलकर बताया वहीं दूसरी ओर गौवंश की उपयोगिता सहित वैज्ञानिक आधार पर गाय के महत्त्व के बारे में भी बताया।
इसी कड़ी में उनसे जब पूछा गया कि भारत में शताब्दियों से गौशाला संस्कृति रही है, इसके बावजूद आज भी आदर्श और स्वावलम्बी गौशालाएं अपवाद ही बनी हुई हैं। ऐसी गौशालाएं शायद ही हों, जिन्हें हम आम जनता के सामने मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सकें। गौशाला संचालकों की मानसिकता आर्थिक स्वावलंबन की ओर न होकर मुख्यतः भावनात्मक दोहन कर दान एकत्र करने वाली है। ऐसे कौन से उपाय अपनाए जाएं जिनसे गौशाला आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बन सकें। गौशालाओं के स्वावलम्बन के सवाल का जवाब देते हुए मानसिंगका ने कहा कि स्वावलम्बन, स्वाभिमान इत्यादि मन के भाव हैं इसलिए स्वावलम्बी बनने के लिए पहले परावलंबी होने के भाव को त्यागना होगा। साथ ही स्वावलम्बन की राह में आ रही परेशानियों की तह में जाकर समस्याओं के निवारण के उपाय अपनाने होंगे। हमने गौशालाओं को आर्थिक रूप से निर्भर बनाने के कई उपायों पर कार्य किया है। जरूरत है इन उपायों को अपनाने और अमल में लाने की। उन्होंने कहा कि हमने देसी तथा दूध न देनेवाली गायों को अर्थोपार्जन का जरिया बनाने के मॉडल पर कार्य किया है और इसे स्थापित भी किया है।
सुनील मानसिंगका ने कहा कि देसी गौमूत्र से फसलों की रक्षा और वृद्धि के लिए कई जैविक उर्वरक बनाये जा सकते हैं। साथ ही गोबर से मानव जीवन के दैनिक उपयोग की कई सामग्री का निर्माण हो रहा है। आज मानव की आवश्यकता रसायन रहित भोजन और प्रदुषण रहित वातावरण है। और यह स्थिति गौआधारित खेती से ही संभव है। यदि गौशालाएं इस दिशा में कार्य करें तो उनके बनाये उत्पाद से होने वाली आय से गौशाला का पूरा खर्च वहन किया जा सकता है। उन्होंने आगे इस पर बात करते हुए कहा कि बाजार की सुनिश्चितता और उपलब्धता पर भी ध्यान देना होगा। शहरों में आज गोबर से बने गमलों, धूपबत्ती, हवन सामग्री, सजावट के सामानों की भारी मांग है। इसलिए मार्केटिंग की समुचित व्यवस्था करनी होगी। मानसिंगकाजी फ़िलहाल देश के कई विश्वविद्यालयों सहित अनेक गौ-सेवी संस्थानों के साथ गौ-विज्ञान अनुसन्धान केंद्र देवलापार की अनुसंधानात्मक गतिविधियों का समन्वय कर रहे हैं। साथ ही इनके दिशा निर्देश में अदुग्धा गायों और गोवत्सों के अपशिष्ट का वाणिज्यिक उपयोग करने का प्रशिक्षण भी किसानों को केंद्र द्वारा दिया जाता है।