गाय के गोबर से अलग-अलग तरह के इको-फ्रेंडली दीये बनाये जा रहे हैं. इन दीयों को गाय के गोबर, घी और इसेंशियल ऑयल से तैयार किया जाता है. गाय के गोबर से बने होने के कारण ये दीये नष्ट होने पर मिट्टी में मिलकर खाद का काम करते हैं यानि इन दीये को इधर-उधर फेंकने के बजाय इनका उपयोग खाद के तौर पर भी सकते है. इन दीये में लेमन ग्रास और मिंट जैसे इसेंशियल्स का भी इस्तेमाल किया गया हैं, जिससे दीयो को जलाकर मच्छरों को भी दूर भगाया जा सकता है. इन दीयों से आने वाली सुगंध वातावरण को सुगन्धित करती है जिससे आस-पास की नकारात्मकता दूर होती है. ये सुगंध नर्व्स को रिलैक्स करके पूरी तरह से आराम देती है.
गौमूत्र की विशेषताएं
- गौमूत्र को सबसे उत्तम औषधियों माना गया है.
- गौमूत्र से बनी औषधियों से कैंसर, ब्लड प्रेशर, आर्थराइटिस, सवाईकल हड्डी संबंधित रोगों का उपचार संभव है।
- गौमूत्र कैंसर जैसे असाध्य रोगों को भी जड़ से दूर कर सकता है. गौमूत्र चिकित्सा वैज्ञानिक कहते हैं कि गाय का लिवर 4 भागों में बंटा होता है. इसके अंतिम हिस्से में एक प्रकार का एसिड होता है, जो कैंसर जैसे रोग को जड़ से मिटाने की क्षमता रखता है. गौमूत्र का खाली पेट प्रतिदिन निश्चित मात्रा में सेवन करने से कैंसर जैसा रोग भी नष्ट हो जाता है.
- गौमूत्र के सेवन से प्लीहा और यकृत रोग नष्ट हो जाते हैं. यकृत, प्लीहा बढ़ना पर 5 तोला गोमूत्र में एक चुटकी नमक मिलाकर पिएं या पुनर्नवा के क्वाथ को समान भाग गोमूत्र मिलाकर लें. प्रभावित स्थान पर गोमूत्र में कपडा भिगोकर हल्की-हल्की सिंकाई करने से भी आराम मिलता है.
- दांत दर्द एवं पायरिया में गोमूत्र से कुल्ला करने से लाभ होता है.
- गोमूत्र में एक चौथाई चम्मच फूली हुई फिटकरी मिलाकर सेवन पुराना जुकाम, नजला, श्वास सम्बन्धी रोग दूर हो जाते हैं.
- सुबह-शाम 4 चम्मच गोमूत्र का सेवन करना हृदय और मधुमेह रोगियों के लिए लाभकारी होता है.
- गौ-मूत्र से मोटापा कम किया जा सकता है. गौ-मूत्र में विटामिन्स पाये जाते हैं जो वजन घटाने में मदद करते हैं. इसके लिए आधे गिलास ताजे पानी में 4 चम्मच गोमूत्र, 2 चम्मच शहद तथा 1 चम्मच नींबू का रस मिलाकर नित्य सेवन करें.
- गोमूत्र पाचन तंत्र को बेहतर करता है.
- गोमूत्र के प्रयोग से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है. इसके लिए दर्द वाले स्थान पर गोमूत्र से सेंक करें और सर्दी में जोड़ों का दर्द होने पर एक ग्राम सोंठ के चूर्ण के साथ गोमूत्र का सेवन करें.
- उच्च रक्तचाप होने पर एक चौथाई प्याले गोमूत्र में एक चौथाई चम्मच फूली हुई फिटकरी डालकर सेवन करें और दमा के रोगी को छोटी बछड़ी का 1 तोला गोमूत्र नियमित पीना लाभकारी होता है।
- पीलिया में 15 दिन तक 200-250 मिली गोमूत्र पीने से लाभ होता है.
- कब्ज या पेट फूलने पर गोमूत्र छानकर उसमें आधा चम्मच नमक मिलाकर पियें.
- गैस की समस्या में प्रात:काल आधे कप गोमूत्र में नमक तथा नींबू का रस मिलाकर पिलाएं. पुराने गैस के रोग के लिए गोमूत्र को पकाकर प्राप्त किया गया क्षार भी गुणकारी है.
- कब्ज की समस्या होने पर हरड़ के चूर्ण के साथ गोमूत्र सेवन करें.
- चर्मरोग में नीम, गिलोय क्वाथ के साथ सुबह-शाम गोमूत्र का सेवन करने से रक्तदोषजन्य चर्मरोग नष्ट हो जाता हैं. इसके अलावा चर्मरोग होने पर ज़ीरे को महीन पीसकर गोमूत्र मिलाकर लेप करना भी लाभकारी है.
- पेट में कृमि (कीड़े) होने पर आधा चम्मच अजवाइन के चूर्ण के साथ 4 चम्मच गोमूत्र एक सप्ताह तक सेवन करने से लाभ मिलता है.
- गाय के मूत्र में पोटैशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, फॉस्फेट, यूरिया, यूरिक एसिड होता है. दूध देते समय गाय के मूत्र में लैक्टोज की वृद्धि होती है, जो हृदय रोगियों के लिए लाभदायक है.
- गौमूत्र में प्रति-ऑक्सीकरण की क्षमता के कारण डीएनए को नष्ट होने से बचाया जा सकता है.
- गौमूत्र में पारद और गंधक के तात्विक गुण होते हैं.
- गौमूत्र में नाइट्रोजन, सल्फर, अमोनिया, कॉपर, लौह तत्व, यूरिक एसिड, यूरिया, फॉस्फेट, सोडियम, पोटैशियम, मैगनीज, कार्बोलिक एसिड, कैल्सियम, विटामिन ए, बी, डी, ई, एंजाइम, लैक्टोज, सल्फ्यूरिक अम्ल, हाइड्रॉक्साइड आदि मुख्य रूप से पाए जाते हैं.
गोमूत्र का अर्क
गोमूत्र में अनेक औषधीय गुण पाए जाते हैं. सुबह खाली पेट एक चम्मच गोमूत्र का अर्क पानी में डालकर पीने से शुगर सहित अनेक बीमारियों में लाभ पहुंचता है.
गोमूत्र का अर्क बनाने के लिए मटके में एक चौथाई गौमूत्र भरते हैं. इसके बाद मटके के नीचे आग जलाकर गोमूत्र को गर्म करते हैं. इस मटके के ऊपर ठंडे पानी से भरा एक विशेष बनावट का छोटा मटका रखते हैं. इसे शीतयंत्र कहते हैं. गोमूत्र जब भाप बनकर ऊपर उठता है तो वह शीतयंत्र में जाता है. यहां पर भाप फिर से पानी बन जाता है. इस पानी को अर्क कहा जाता है.
इस अर्क में कार्बोनिक एसिड प्राकृतिक रूप से पाया जाता है. यह दवाइयों सहित साबुन, टूथपेस्ट और सौंदर्य प्रसाधनों में भी डाला जाता है। यह एंटी बैक्टिरिया और एंटी फंगल होता है.
गोबर से बायो सीएनजी प्लांट
गोबर से बायो सीएनजी (CNG) बनाई जाने लगी है. ये वैसे ही काम करती है, जैसे घरों में LPG काम करती है. ये LPG से काफी सस्ती पड़ती है और इससे पर्यावरण भी दुष्प्रभावित नहीं होता है. बॉयो CNG प्लांट गोबर गैस की तरह काम करता है, लेकिन प्लांट से निकली गैस को बॉयो CNG बनाने के लिए अलग से मशीनें लगाई जाती हैं.
गोमूत्र कीटनाशक
गोमूत्र का प्रयोग फसल सुरक्षा रसायन के रूप में कीड़ों के नियंत्रण के लिये किया जाता है|
गोमूत्र में नाइट्रोजन, गन्धक, अमोनिया, कापर, यूरिया, यूरिक एसिड, फास्फेट, सोडियम, पोटैशियम, मैग्नीज, कार्बोलिक एसिड इत्यादि पाये जाते हैं और इसके अतिरिक्त लवण, विटामिन ए, बी, सी, डी, ई, हिप्युरिक एसिड, क्रियाटिनिन, स्वर्ण क्षार पाये जाते हैं|
गाय के एक लीटर गोमूत्र को एकत्रित कर 40 लीटर पानी में घोलकर यदि दलहन, तिलहन और सब्ज़ी आदि के बीज को 4 से 6 घंटे भिगो कर खेत में बुवाई की जाती है तो बीज का अंकुरण अच्छा, जोरदार और रोग रहित होता है। बीज जल्दी जमता है। इसके इस्तेमाल से भूमि के लाभकारी जीवाणु भी बढ़ते हैं। जो भूमि ख़राब है वो ठीक हो जाती है| सिंचाई के लिए कम पानी की ज़रूरत पड़ती है, क्योंकि भूमि की बारिश का पानी सोखने और रोकने की क्षमता बढ़ जाती है| गोमूत्र कीटनाशक से फसल हरी-भरी हो जाती है और रोगों का प्रकोप कम होता है|
कीटनाशक
दो से तीन लीटर गोमूत्र को 15 दिन तक किसी डिब्बे में भरकर सड़ाने के बाद छानकर इसे 50 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने से कई प्रकार के कीड़े, नियन्त्रित होते हैं| जैसे पत्ती खाने वाला कीड़ा, फल छेदने वाला कीड़ा, तना छेदक आदि|
गोमूत्र और कुछ वनस्पतियों को मिलाकर बनाया गया कीटनाशक लगभग सभी प्रकार के कीड़ों से नियंत्रण करता है| ये कीटनाशक कुछ रोगों और फसल पर पोषक तत्व के पूरक के रूप में भी प्रभावशाली होता है| इसके छिड़काव के बाद नील गाय तथा जंगली जानवरों से भी फसल सुरक्षित रहती है|
इसे बनाने के लिये 20 लीटर गोमूत्र एकत्र करके इसे किसी प्लास्टिक डिब्बे या ड्रम में डाल देना चाहिये, इसके बाद उसमें 5 किलोग्राम नीम की ताजी पत्तियाँ तोड़कर डालनी चाहिये|
नीम की पत्ती डालने के बाद 2 किलोग्राम धतूरा के पंचाग अर्थात् जड़, तना, पत्ती, फूल, फल इत्यादि को ताजा या सुखाकर डालना चाहिये| इसके बाद दो किलोग्राम मदार जो पचांग या पत्ती के रूप में हो सकता है, को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर डालना चाहिये, इसके बाद 500 ग्राम लहसुन को कुचलकर उसमें डालना चाहिये|
इसके बाद 250 ग्राम तम्बाकू की पत्तियों को डालना चाहिये| इसके बाद अन्त में 250 ग्राम लाल मिर्च पाउडर को डालकर डिब्बे में किसी लकड़ी की सहायता से हिलाकर ढक्कन को बंद कर अच्छी तरह वायुरोधी बनाकर खुले स्थान पर रख देना चाहिये| ध्यान रहे कि डिब्बे पर धूप लगनी चाहिए|
यह प्रक्रिया 40 दिन तक चलने देते हैं, 40 दिन बाद किसी पतले सूती या मलमल के कपड़े से इस घोल को अच्छी तरह से हिलाकर छान लेते है| छनित तरल पदार्थ का प्रयोग फसल रक्षक रसायन के रूप में करते हैं एवं छनित वनस्पतियों को सुखाकर दीमक इत्यादि के नियंत्रण के लिये भी प्रयोग किया जाता है|
इस दवा का फसल पर प्रयोग करने के लिये एक लीटर दवा को 80 लीटर पानी में घोलकर खड़ी फसल पर छिड़का जाता है| जिससे छेदने वाले, काटकर खाने वाले रस चूसने वाले कीटों का नियंत्रण तो होता ही है, साथ ही फसल पर नील गाय और जंगली भैंसा तथा जंगली सांड भी नुकसान नहीं पहुंचा पाते|| इस कीटनाशी में प्रयोग की जाने वाली सामग्री आसानी से आसानी से मिल जाती है|
इसके छिड़काव से फसल हरी-भरी हो जाती है एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है
इस दवा का प्रयोग मक्का, कपास, तम्बाकू, टमाटर, दलहन, गेहूं, धान, सूरजमुखी, फल, केला, भिन्डी, गन्ना इत्यादि सभी फसलों में सफलतापूर्वक किया जा सकता है|
गौमूत्र और तम्बाकू
10 लीटर गोमूत्र में एक किलोग्राम तम्बाकू की सूखी पत्तियों को डालकर उसमें 250 ग्राम नीला थोथा घोलकर 20 दिन तक बन्द करके किसी डिब्बे में रख देते हैं| 20 दिन बाद इसको निकालकर छानकर एक लीटर दवा को 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से बालदार सुंडी का विशेष नियंत्रण होता है| इसका प्रयोग भी दोपहर के बाद करना अच्छा रहता है|
गोमूत्र और लहसुन
दस लीटर गोमूत्र में 500 ग्राम लहसुन कूटकर उसमें 50 मिलीलीटर मिट्टी का तेल मिला देते हैं| इस मिट्टी के तेल और लहसुन के मिश्रण को गोमूत्र में डालकर 24 घंटे पड़ा रहने देते हैं| इसके बाद इसमें 100 ग्राम साबुन अच्छी तरह मिलाकर इस मिश्रण को अच्छी तरह हिलाकर बारीक कपड़े से छान लें, एक लीटर दवा को 80 लीटर पानी में घोलकर प्रातःकाल छिड़काव करने से रस चूसक कीड़ों से फसलों को बचाया जा सकता है|
वृद्ध गोबंश जैसे- गाय, बैल आदि का मूत्र बहुत आसानी से, थोड़ा सावधानी और ध्यान देने से एकत्रित किया जा सकता है|
गोमूत्र का एकत्रीकरण, अपनी सुविधानुसार प्लास्टिक के डिब्बे की सहायता से या पक्की गौशाला के पास पक्की नाली व टंकी की सहायता से एकत्रित कर किया जा सकता है|
गो उत्पाद
गोवंश केवल दूध, दही, घी, गोबर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सामान्य प्रशिक्षण से गोबर और गौमूत्र से कई प्रकार के उत्पाद बनाकर आय प्राप्त की जा सकती है. गाय के गोबर और गोमूत्र से कई आयुर्वेदिक औषधियां, जैविक कृषि के लिए उत्तम खाद और रसोई गैस बनाई जाती है. इससे पेपर, बैग, मैट से लेकर ईंट तक कई सारे उत्पाद बनाए जाते हैं. गाय के गोबर से गोअर्क, दंत मंजन, साबुन, पेंट, वैदिक प्लास्टर, गमले, सजावट के सामान, माला, चूड़ियां, मोबाइल स्टीकर जैसे उत्पाद भी तैयार किए जाते रहे हैं. गोमूत्र में एंटी बैक्टीरियल गुण और एसिड होने के कारण इससे फेनाइल भी तैयार किया जाता है.
शांतिधारा अनुसंधान केंद्र
शांतिधारा गौशाला एवं पंचगव्य अनुसंधान का संचालन संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज की प्रेरणा और आशीर्वाद से ब्रह्मचारी भाईयों के निर्देशन में हो रहा है.
इस गौशाला में 500 गौवंश है और 130 एकड़ में इसका विस्तार है. गौशाला में 100 एकड़ में जैविक खेती करके अनाज और पशु आहार तैयार किया जाता है.
यह एक समाज सेवी संस्था है जिसके प्रमुख उद्देश्य स्वदेशी जीवन शैली को बढ़ावा देना है. इसके अलावा देसी गौ पालन और जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में भी संस्था कार्य कर रही है.
यहाँ समय समय पशुपालन एवं जैविक खेती पर सामूहिक और व्यतिगत प्रशिक्षण नि:शुल्क प्रदान किया जाता है. जैविक बीज, खाद और कीटनाशक के साथ किसानो को गाय, बैल और नंदी भी प्रदान किये जाते हैं.
Website : https://shantidhara.in
गो-विज्ञान अनुसंधान केंद्र, नागपुर
गो-आधारित उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए नागपुर में ‘गो-विज्ञान अनुसंधान केंद्र’ की स्थापना की गई है. ‘गो-विज्ञान अनुसंधान केंद्र’ मानव जीवन की बेहतरी में गायों और उनकी संतानों की भूमिका पर अनुसंधान और विकास के लिए समर्पित है।
Website : http://govigyan.com/
गाय के गोबर से बना ‘खादी प्राकृतिक पेंट’
खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) ने गाय के गोबर से प्राकृतिक पेंट बनाया है. पूरी तरह गंधहीन ये पेंट एंटीबैक्टीरियल, इको फ्रेंडली और एंटी फंगल है. इसमें आम डिस्टेंपर या पेंट की तरह विषैले पदार्थ भी नहीं हैं. इस पेंट में सीसा, पारा, क्रोमियम, आर्सेनिक, कैडमियम जैसे भारी धातुओं का असर भी नहीं है. यह पेंट पर्यावरण के अनुकूल, नॉन-टॉक्सिक, गंधहीन और सस्ता है.
इस पेंट को ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड ने भी प्रमाणित किया है. गाय के गोबर से बने इस पेंट से दीवार रंगते हैं तो महज 4 घंटों में ही सूख जाता है, जबकि केमिकल वाले पेंट में ठीक से सूखने में कई घंटे लगते हैं और गंध की समस्या अलग होती है. गंध की वजह से कई लोगों को एलर्जी भी हो जाती है. इस पेंट में अपनी जरूरत के हिसाब से कोई और रंग भी मिलाया जा सकता है.
खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के इस उत्पाद से किसानों की आमदनी बढ़ेगी. रोजगार को बढ़ावा मिलेगा और किसान या आम लोग गोबर को बेचकर अच्छा पैसा कमा सकेंगे.
ग्रामीण इलाकों में आज भी गाय के गोबर से घर को लिपा-पोता जाता है. एंटीबायोटिक की तरह काम करने के कारण गाय का गोबर घरों में नुकसानदायक बैक्टीरिया या जीवाणु को निष्क्रिय कर देता है. पूजा-पाठ के स्थान को भी गोबर से लेप किया जाता है. अब गाय के गोबर से बना पेंट बाजार में उपलब्ध है.
स्वानंद गोविज्ञान
स्वानंद गोविज्ञान एक ऐसा संगठन है जो देशी गाय की नस्ल के उत्थान के लिए काम कर रहा है. ये संगठन गौशाला का एक स्थायी और आत्मनिर्भर मॉडल बनाने में मदद करने के लिए विभिन्न प्रकार की सेवाएं और पूरे भारत में गौ उत्पाद प्रशिक्षण प्रदान करता है. यहाँ विभिन्न प्रकार के सांचों के उपयोग से धूपस्टिक, दीपक, मूर्तियाँ आदि बनाने का काम किया जाता है.
स्वानंद गोविज्ञान किसानों, गौपालकों और महिलाओं को रोजगार प्रदान करके की दिशा में एक मिशन के रूप में कार्य कर रहा है.
Website : https://www.swanandgovigyan.com










